लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान जनता पर सरकार ने पेट्रोल, रसोई गैस और डीजल के दाम में बढ़ोत्तरी कर फिर से कहर बरपाया है। महंगाई की मार से त्रस्त जनता आशा कर रही थी कि खाद्य पदार्थों के आसमान छूती कीमतों पर सरकार लगाम लगाएगी। किन्तु सरकार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ा कर जनता को राहत देने के बजाए उसकी जेब कतरने में लगी है। पहले से ही महंगाई की मार से झुकी लोगों की कमर को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया है देश के नेताओं ने।
पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढऩे का मतलब है कि सभी खाद्य पदार्थों से लेकर यातायात किराये में बढ़ोत्तरी होगी। ऐसा करके सरकार ने आम जनता के पेट पर सीधे लात मारी है। सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में ज्यादातर मध्य वर्ग, निम्म मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोग हैं। सीमित कमाई होने की वजह उन्हें बहुत सोच समझकर घर का बजट चलाना होता है, ऐसे में रोज़मर्रा के सामान की कीमत में लगातार होती वृद्धि ने उनके बजट-संतुलन को हिला कर रख दिया है। अन्य समानों में कटौती के साथ-साथ अब तो भोजन में भी कटौती करने की नौबत आ गई है। अब लोगों के जीवन का दायरा किसी तरह पेट पालने में ही उलझ कर रह गया है।
ज्यादातर परिवार ऐसे हैं जिनके लिए सौ रुपए किलो दाल खरीदना बिल्कुल ही संभव नहीं है। सब्जी, दूध, चीनी जैसी जरूरत की चीजों में बहुत कटौती करनी पड़ रही है। पहले गरीबों का खाना दाल रोटी हुआ करता था किन्तु अब उन्हें रोटी नमक भी मुश्किल से नसीब हो रहा है। सामान्य आय वर्ग के लोग तो किसी तरह खा ले रहे हैं किन्तु गरीब कुपोषण के शिकार हो भूखों मर रहे हैं। सरकार है कि लोगों को पौष्टिक खाना तो भूल ही जाएं रोटी, दाल, चावल भी उचित कीमत पर उपलब्ध नहीं करा रही है। जिससे आम जनता पेट भर खा सके। सरकार कहती है कि देश तरक्की कर रहा है किन्तु वास्तविकता के धारातल पर देखें तो समझ में आएगा कि यह कैसी तरक्की है, जहां लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं। लोग पानी बिजली के लिए तरस रहे हैं। देश में हजारों टन गेहूं सड़ रहा है और सरकार अनाज की कमी का रोना रोकर खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ाए जा रही है। कभी कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर सरकार जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ाती है तो कभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में वृद्धि के नाम पर अपने नागरिकों पर और बोझ डाल देती है।
जिस देश में कॉमन-मैन को दो जून का भोजन नहीं मिलता हो ऐसे देश में कॉमन वेल्थ गेम का क्या औचित्य है? खेल केआयोजन पर हजारों करोड़ रुपए का खर्च और भूखे पेट के लिए भोजन के आयोजन पर कुछ नहीं? खेल के इस खर्चे का बोझ भी जनता के ही सिर मढ़ दिया जाएगा। कांग्रेस ने अपने पिछले पांच साल के शासन में विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी का रोना रोकर कीमतों मे इजाफा किया था पर आर्थिक संकट का दौर समाप्त हो जाने के बाद भी घरेलू सामान की कीमतों में लगातार होती बढ़ोत्तरी जनता की समझ से परे है।
सुविधा प्रदान करने के नाम पर सरकार जनता से टैक्स तो वसूल कर लेती है किन्तु जनता के पैसे पर सुविधाएं मंत्री, एमपी, एमएलए भोगते हैं। एसी बंगला, एसी गाड़ी, एसी दफ्तर, 24 घंटे बिजली पानी की व्यवस्था, मुफ्त हवाई यात्रा, मुफ्त टेलिफोन सुविधा और न जाने क्या-क्या सुविधाएं इन्होंने देश और जनता की सेवा के नाम पर ले रखी हैं। सिर्फ जनता ही महंगाई की मार और कटौती का दुख क्यों सहे? इन सुविधाभोगी मंत्रियों पर भी कटौती की कैंची चलनी चाहिए। अगर जनता को सुविधा नहीं मिल रही है तो इन मंत्रियों का नैतिक दायित्व बनता है कि वे भी अपनी सुविधा का परित्याग करें। किन्तु आज के नेताओं में नैतिकता बची ही कहां है।
जनता ने कांग्रेस को इस आशा से सत्ता सौंपी थी कि यह सरकार जनता की समस्याओं को समझेगी और उसे दूर करेगी, किन्तु कांग्रेस सरकार उद्योगपतियों और कालाबाजारियों का हित साधने में लगी है। कांग्रेस की सरकार के आने के बाद महंगाई जितनी तेजी से बढ़ी है शायद ही कभी बढ़ी होगी। वर्तमान सरकार अपने हर मोर्चे पर विफल रही है चाहे वह नक्सलवाद का मुद्दा हो, आतंकवाद का या फिर महंगाई का। यह आम जनता की कसौटी पर खड़ी नहीं उतर पा रही है। अगर सरकार जनता की निहायत जरूरी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पा रही तो ऐसी सरकार का नैतिक दायित्व बनता है कि वह त्यागपत्र दे दे।