Friday, October 1

कॉमन-वेल्थ 'लूट' गेम

सुबह-सुबह अखबार देखा तो पहले ही पेज पर खेल गांव में फैली कुव्यवस्था और गंदगी की पोल खोलती रिपोर्ट और तस्वीरें सामने थीं। इधर अखबारों में लगातार राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में होने वाले विलंब और भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं। इसमें नवनिर्मित फुट-ब्रिज का ढहना हो, खेलगांव में खिलाडिय़ों के लिए बनाए गए फ्लैट से सांप निकलने की घटना हो, फ्लैट में फैली गंदगी का मामला हो या आधी अधूरी तैयारी का। सरकार और आयोजन समिति की लचर नीति और आपसी समन्वय में कमी का ही नतीजा है कि चार साल का समय और हजारों करोड़ रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी तैयारी पूरी नहीं हो पायी। भारत जैसे विकासशील देश को राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन का अधिकार मिलना गौरव की बात है। ऐसे में भारत को विश्व के सामने अपनी क्षमता दिखाने का सुअवसर मिला था लेकिन सरकारीतंत्र की लापरवाही और भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति ने भारत को विश्व के सामने शर्मसार कर दिया है। सरकार और आयोजकों ने समय रहते कार्य पूरा न कर, अपनी अक्षमता विश्व के समक्ष प्रकट की है और यह साबित कर दिया है कि बड़े अंतराष्ट्रीय आयोजन करना भारत के बूते की बात नहीं है। पड़ोसी देश चीन का उदाहरण लें जिसने ओलम्पिक खेल का आयोजन सफलता पूर्वक कर, जिस तरह अपनी शक्ति और क्षमता का प्रदर्शन किया वह काबिले तारीफ है। अपने देश के प्रति उनकी इज्जत की भावना और प्रतिबद्धता ने ही आयोजन को सफल बनाया था।

राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी हों या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित या खेलमंत्री एमएस गिल, अगर यह अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ निभाते हुए समय रहते काम पूरा कर लेते तो आज विश्व में हमारी इतनी फजीहत नहीं होती। लेकिन ईमानदारी और प्रतिबद्धता की उम्मीद देश के सरकारी तंत्र से तो की नहीं जा सकती है। हां मुंहजोरी में इनका कोई सानी नहीं है। अपनी गलतियों को मानने के बजाए ये एक दूसरे पर दोषारोपण करने से बाज नहीं आ रहे हैं। खेल आयोजक दिल्ली प्रशासन पर दोष मढ़ रहा है तो दिल्ली सरकार काम सही ढंग से नहीं होने का ठीकरा खेलगांव के डेवलपर्स पर फोड़ रही है। किन्तु दिल्ली सरकार यह भूल रही है कि इन डेवलपर्स से काम लेने की जिम्मेदारी उनकी ही है। अगर दिल्ली सरकार अपने काम के प्रति इतनी ही सजग होती तो डेवलपर्स जरूर अपना काम सही ढंग से और समय पर करते, लेकिन यहां तो सभी एक दूसरे के साथ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तो कौन किसको क्या कहे। नवनिर्मित फुट ब्रिज का ढहना राष्ट्रमंडल खेल में होने वाले भ्रष्टाचार का एक छोटा उदाहरण मात्र है। राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर ऐसे सैकड़ों करोड़ों के घपले हुए हैं जिसपर सरकार ने खेल के समापन के बाद कार्रवाई की बात की तो लेकिन यह सिर्फ जनता को झांसा देने के लिए है। क्योंकि इस घपले में सरकार से लेकर आयोजन समिति तक सभी शामिल है तो क्या वे खुद पर कार्रवाई करेंगे? किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी यह जनता को समझ लेना चाहिए। रात गई बात गई वाली कहावत यहां चरितार्थ होने वाली है।

चोरी और सीनाजोरी का एक और उदाहरण ले लें, जब राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के प्रमुख माइक फेनेल ने खेलगांव में फैली गंदगी पर असंतोष जाहिर किया तो आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट का बयान आया कि उनके यहां सफाई का पैमाना अलग है और हमारे यहां अलग। यह कह कर भनोट ने तो पूरे विश्व में यह साबित कर दिया कि भारत के लोग गंदगी में जीने के आदी हैं। भारत में सफाई का क्या पैमाना है यह भनोट जैसे अधिकारी और देश के राजनीतिज्ञ ही तो बताएंगे, जिन्होंने पूरे देश में अपने आचार, विचार और व्यवहार से गंदगी फैला रखी है। देश को कैसे साफ-सुथरा रखा जाए इसके लिए न तो खुद जागरूक हैं और न ही नागरिकों को जागरूक करने की जरूरत समझते हैं। हां सरकारी खजाने पर हाथ साफ कैसे किया जाए इस मामले में ये बड़े जागरूक होते हैं। जितनी सजगता और तन्मयता से इन लोगों ने खेल के नाम पर घपला किया है अगर उतनी ही तन्मयता से खेल की तैयारी में लगे रहते तो आज विश्व के सामने देश की इतनी फजीहत नहीं होती।