ताज अपनी चमक को मोहताज
विश्व प्रसिद्ध ताज महल एक बार फिर से चर्चा में है। इस बार
कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि मसला इसकी फीकी पड़ती खूबसूरती को लेकर चिंता
का है। अभी हाल ही में संसद में इस मामले पर चिंता जताई गई और भारतीय पुरातत्व
सर्वेक्षण विभाग व उत्तर प्रदेश सरकार को इस मुद्दे पर वास्तविक स्थिति की जानकारी
देने को कहा गया। मामले को गंभीरता से लेते हुए विशेषज्ञों का दल नियुक्त कर इसकी
जांच करने की भी जरूरत महसूस की गई। ताजमहल के संरक्षण से जुड़े केंद्रीय पर्यावरण
सचिव के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने भी पर्यावरण संबंधी स्थायी संसदीय
समिति के सामने स्वीकार किया कि ताज पर प्रदूषण का असर काफी दिख रहा है। ताज महल
की फीकी पड़ती चमक और संरक्षण को लेकर वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा
लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं और इस धरोहर की चमक कम करने वाले खतरों से सरकार को
अगाह भी किया जाता रहा है, बावजूद इसके इस वैश्विक धरोहर की रक्षा के लिए कोई ठोस और स्थाई कदम अभी तक
नहीं उठाया जा सका है।
शिल्प कला का बेजोड़ नमूना ताज धीरे-धीरे अपनी खूबसूरती ओर
चमक खोता जा रहा है। लगभग चार दशक पहले ही 1970 की शुरुआत में पर्यवक्षकों को ताजमहल की चमक
कम होने का आभास हो गया था। इसकी चमक खोने का कारण जानने में लगे वैज्ञानिकों और
शोधकर्ताओं ने ताजमहल की फीकी पड़ रही दूधिया चमक की वजह कार्बन और धूलकण बताया।
अभी हाल ही में भारत और अमेरिका के शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रदूषण की वजह से
संगमरमर से बने ताजमहल का रंग पीला पड़ता जा रहा है। जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ
टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर माइकल बर्गिन और उनकी टीम यह पता लगाने में सफल रही कि ताजमहल
की चमक को फीका करने वाले प्रदूषित तत्व जैव ईंधन, अपशिष्ट, जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन कण
और धूल कण हैं। इस अध्ययन में आईआईटी कानपुर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और विस्कोंसिन
यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने ताजमहल की चमक के फीका पड़ने
की वजह जानने के लिए हवा के नमूनों की जांच करने वाले उपकरणों का प्रयोग किया। इन
उपकरणों को ताजमहल के कई स्थानों पर रखा गया और संगमरमर के नमूने लिए गए। उन्हें
उपकरण के फिल्टर में और संगमरमर नमूनों पर भूरे ऑर्गेनिक कार्बन और काले कार्बन के
कण मिले। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ताजमहल के हल्के पीलेपन की वजह लाखों की
संख्या में आने वाले दर्शकों की सांस से निकलने वाली कार्बन डाईआक्साइड गैस भी हो
सकती है। वैसे इस मामले की जांच नेशनल इन्वायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट
(एनईईआरई) द्वारा कराई जा रही है। इसके अलावा यमुना का सूखना भी मुख्य कारण माना
जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों का कहना है कि वातावरण में रेत
के कण सामान्य से बहुत ज्यादा हैं लेकिन यदि यमुना में पर्याप्त पानी हो तो वायु
में इनकी मात्रा कम हो सकती है। ताजमहल को सूखी और प्रदूषित यमुना से खतरे का
अंदेशा पहले भी जताया जाता रहा है। इतिहासकार इरफ़ान हबीब का मानना है कि ताजमहल
के पीछे से बहने वाली यमुना ही ताजमहल की सुरक्षा की गारंटी है। उसमें जल स्तर हर
हाल में बरकरार रहना चाहिए। वरदराजन समिति ने कहा था कि ताजमहल के आसपास की
परिस्थतियों से किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।
छुट्टी और सप्ताहांतों में होने वाले पर्यटकों की भारी भीड़
भी ताज को क्षति पंहुचा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो इस तरह की अनियंत्रित और
गैर अनुशासित भीड़ जो वहां के नियमों का पालन नहीं करते हुए अपनी मनमानी करती है,
उससे भी ताज को भारी नुकसान
पहुंच रहा है। रोजाना हजारों की संख्या में आने वाले सैलानी अपने हाथों से ताज की
दीवार को रगड़ते और खुरचते हैं, जिससे ताज की चमक फीकी पड़ रही है। संगमरमर पर उभरे बदरंग धब्बों को देखकर ऐसा
लगता है कि ताजमहल की खूबसूरती खत्म होने की शुरुआत हो गई है। यदि यह सिलसिला जारी
रहा तो ताज की चमक हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के लोग भी समय-समय पर ताजमहल
में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत करा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं,
लेकिन दूषित पर्यावरण से
होने वाली हानि को दूर करने का उपाय तलाशने में वे कतई सचेष्ट नहीं होते। कुछ
अर्सा पहले पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने प्रतिदिन पर्यटकों की बढ़ती संख्या के
कारण धंसते जा रहे स्मारक और ताज की घिसती सीढ़ियों को लेकर चिंता जताई थी।
उन्होंने स्मारक की सैर करने वाले सैलानियों की ताज में ठहरने की अवधि कम करने का
प्रस्ताव दिल्ली मुख्यालय को भेजा था लेकिन इस पर अभी तक किसी भी तरह का निर्णय
नहीं लिया गया। ताज में उर्स के दौरान उमड़ने वाली सर्वाधिक भीड़ और गर्मियों में
घटती पर्यटकों की संख्या के समय वातावरण में मौजूद गैसों के सैंपल लिए गए हैं। ताज
के गुंबद पर लोगों की तादाद और उससे ताजमहल पर पड़ने वाले असर का ब्यौरा भी जमा
किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ताजमहल के मुख्य गुंबद पर जाने वाले
पर्यटकों की संख्या निर्धारित की जाएगी। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत धीमी चाल से चल
रही है। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने ताज में बढ़ते सैलानियों की संख्या देखते
हुए दबाव कम करने का मन बनाया है। इस बारे में मुख्यालय को एक प्रस्ताव भेजा गया
है, जिसमें सलाह दी गई है कि
मुख्य गुंबद पर एक समय में सैलानियों की संख्या निर्धारित कर दी जाए। बीते साल 80 लाख से अधिक देसी सैलानी ताजमहल देखने आए।
इससे पहले के वर्षों में यह संख्या 30 से 35 लाख तक हुआ करती थी।
ताज के मुख्य गुंबद के भार उठाने की क्षमता का भी आकलन किया
जा रहा है। एएसआई के एक अधिकारी ने ताज की नींव कमजोर होने को लेकर उठ रहे सवालों
के बारे में कहा कि कुछ वर्षों पहले ही नींव में दरार पड़ने की घटना सामने आई थी
लेकिन उसकी मरम्मत कर ली गई थी। ताज महल की देखरेख की जिम्मेदारी संभालने वाले
पुरातत्व विभाग की लापरवाही और उत्तर प्रदेश प्रशासन की कुव्यवस्था भी ताज को बहुत
नुकसान पहुंचा रही है। पुरातत्व विभाग और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच खींचतान और
बेवजह की सियासत भी ताज के लिए हानिकारक है। ताजमहल में मक़बरे के ऊपर बनी एक
मीनार के तीन इंच झुकने की बात कही गई थी, लेकिन पुरातत्व विभाग इन ख़बरों को गलत बताता है। जबकि
उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बना कर इसे
राजनीतिक रंग देने की पूरी कोशिश की थी। पुरातत्व विभाग का कहना है कि ताज की
देखरेख उसके जिम्मे है तब उत्तर प्रदेश सरकार इसकी जांच के लिए समिति कैसे बना
सकती है।