
हर साल की तरह इस बार भी स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियां चल रही हैं या यूं कहिए की औपचारिकता निभाई जा रही है। क्योंकि देशभक्ति की भावना अब लोगों में वैसी नहीं रही जैसी आजादी के लड़ाकों में थी। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल तक इस देश को गुलामी की जंजीर में जकड़े रखा। गांधी, मालवीय, गोखले, बोस, भगत सिंह और आजाद जैसे क्रातिवीरों के अथक प्रयास और बलिदान के कारण ही हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं। आज 63 साल हो गए हमें स्वतंत्र हुए। क्या सही अर्थ में हम स्वतंत्र हो पाए हैं? क्या हमने अपने महापुरुषों के बलिदान का मान रखा है? उन्होंने आजाद भारत के विकास और स्वरूप की जो कल्पना की थी क्या यह देश उस पर खरा उतर पाया है? राष्ट्र पर न्यौछावर होने की भावना जो उस समय के लोगों में थी क्या वैसी भावना आज के लोगों में है। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिन महापुरुषों ने अपनी जान दे कर देश को आजादी दिलाई थी आज उनका देश ऐसे अनैतिक, मौकापरस्त और स्वार्थी लोगों के चंगुल में फंसा है जो अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक और क्रूर हैं। अंग्रेज तो विदेशी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर हमने उन्हें इस देश से तो खदेड़ दिया लेकिन वे लोग जो कहने को हमारे अपने हैं इस देश के कर्णधार बन इसकी इज्जत और अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने के साथ-साथ दीमक की तरह चाट कर उसे खोखला भी कर रहे हैं। ऐसे भीतरघातियों को कहां खदेड़ा जाए? 63 साल आजादी के बाद भी देश में स्वस्थ सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो पायी है। देश की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों के कार्यों में दिन प्रति दिन गिरावट है। व्यवस्था को चलाने वाले लोगों के चरित्र में ही गिरावट आ गई है तो व्यवस्था स्वत: धाराशाई हो ही जाएगी। आज भी आम लोगों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे आजादी के पहले थी। समाज में जिनके पास पावर और पैसा है, वे ही आजादी का सुख उठा रहे हैं। देश की सत्ता जिस राजनीतिक दल के पास होती है। ये राजनेता सत्ता की आड़ में मनमानी करते हैं, पूर्ण रूप से अराजक हो जाते हैं। तभी तो भारत में घोटालों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है और घोटाला करने वाले नेता आजाद भारत में आजादी का असली मजा ले रहे हैं। उन पर किसी तरह की कोई कानूनी पाबंदी नहीं है क्योंकि वे सत्ताधारी हैं, या कभी न कभी अदल बदल कर सत्ता का सुख भोगते रहे हैं। देश का कानून तो छोटे मोटे गुंडों और चोर उचक्कों के लिए है। जो समाज का अहित तो करते है लेकिन छोटे स्तर पर। किन्तु देश का कानून तथाकथित बड़े लोगों (यहां बड़े लोगों कहने का तात्पर्य विचारवान और संस्कारी लोगों से नहीं है क्योंकि आज बड़े लोग की परिभाषा बदल गई है, जिनके पास पैसा और पावर है आज के बड़े लोग वे ही हैं) के बड़े-बड़े काले कारनामों के बाद भी उनकी कारगुजारियों को अनदेखा कर देती है क्योंकि इन्हीं बड़े लोगों की जेब में कानून रहता है। इन्हीं बड़े लोगों के कारण आज देश रसातल में जा रहा है। देश का समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। देश की जनता भी समय के साथ चलने की बात कर, इन बड़े लोगों का अनुसरण करने लगी है और जिसको जहां मौका मिलता है वहां लाभ और लूट में भागीदार बन जाते हैं, ताकि वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में आ सकें। छोटे से लेकर बड़े स्तर तक हर कोई एक दूसरे को लूटने में लगा है। कुछ एक ईमानदार लोग बचे हैं, उन्हें भी सीख दी जाती है समय के साथ बदलने की। उनकी ईमानदारी उनकी मूर्खता समझी जाती है। कुछ तो समाजिक दबाव में खुद को बदल लेते हैं लेकिन जो साहस कर इस व्यवस्था से लडऩे की हिम्मत रखते हैं उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है नहीं तो चुपचाप कुव्यवस्था को देख कर कुढऩे के अलावा वे और कुछ नहीं कर पाते। वे खुद को आजाद भारत की गुलाम जनता के रूप में पाते हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा भारतवर्ष विश्व के भ्रष्टतम देशों की सूची में शामिल है। हमारे महापुरुषों और क्रांतिकारियों ने क्या ऐसे ही भ्रष्ट देश के लिए बलिदान दिया था? आज उनकी आत्मा देश की दुर्दशा पर आंसू बहा रही होगी। सत्ताभोगियों ने देश को ही नहीं बल्कि महापुरुषों के त्याग और बलिदान को भी शर्मसार किया है, उनके आदर्श भारत की कल्पना को धूलधुसरित कर दिया है।
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