
बात अधिक दिन पुरानी नहीं है, अभी चार जून की रात को राम लीला मैदान में पुलिस ने जो बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की उसे कांग्रेस सरकार के बुरे दिनों की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है। बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में देश के कोने-कोने से आए उनके समर्थकों पर पुलिस द्वारा की गई अमानवीय, अनैतिक और पशुवत व्यवहार देश के समक्ष कांग्रेस सरकार की तानाशाही मानसिकता का प्रदर्शन था। बाबा के समर्थकों का दोष इतना भर था कि वे देश में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में शामिल थे। जनता देश में फैली महंगाई और भ्रष्टाचार से इतनी त्रस्त हो चुकी है कि ऐसे किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी नेतृत्व को खुले दिल से अपना समर्थन देने को तत्पर है जो इस त्रासदी से उन्हें निजात दिला सके। वो चाहे अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को जो अपार जन समर्थन मिला उसकी मुख्य वजह कांग्रेस सरकार के शासन काल में लगातार हुए घोटाले और असह्य महंगाई है। सरकारी तंत्र घोटाला कर राजकोष खाली करता रहा और इसका खमियाजा सरकार आम जनता पर महंगाई का बोझ डाल कर पूरा करती रही। राष्ट्रमंडल खेल और 2-जी स्पेट्रम घोटाले में सरकारी धन की जिस तरह लूट हुई है उससे सम्पूर्ण देश हतप्रभ है। और इस जन आक्रोश के लिए केंद्र सरकार का पाप जिम्मेदार है। यदि सरकार काले धन की वापसी और भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रति इतनी ही सजग और ईमानदार होती तो बाबा रामदेव और अन्ना हजारे को अनशन करने की जरूरत ही क्यों पड़ती?
अन्ना हजारे की मांगों को मानने का आश्वासन देकर के सरकार ने उनका अनशन खत्म किया लेकिन बाद में वादाखिलाफी कर दी। उसी तरह का प्रयास बाबा के आंदोलन को खत्म करने के लिए हो रहा था, लेकिन बाबा ने अनशन समाप्त करने से इंकार कर सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया और आखिरकार सरकार ने पुलिसिया बल का सहारा लेकर आंदोलन को बल पूर्वक कुचल डाला। कपिल सिब्बल, प्रणब मुखर्जी, सुबोधकांत सहाय और पवन बंसल जैसे शातिर परिपक्व राजनीतिज्ञों के सामने योग गुरु की क्या बिसात थी। तभी तो कपिल सिब्बल ने अपनी शातिराना चालबाजी का परिचय देते हुए बाबा रामदेव के सत्याग्रह आंदोलन को तहस-नहस कर बाबा पर ही अपने समर्थकों के साथ धोखा करने का आरोप मढ़ कर सिर्फ योग सिखाने की सलाह दी और हिदायत दी कि वे राजनीति नहीं करें। जैसे राजनीति तो उन जैसे नेताओं की बपौती हो!
बाबा राम देव जबतक सिर्फ योग गुरु थे वे नेताओं के भी प्रिय थे लेकिन जब से उन्होंने भ्रष्टाचार और काले धन की वापसी की बात की तबसे वे सरकार की आंख में कांटे की तरह चुभने लगे। उन पर ठग, धोखेबाज, जालसाज होने के आरोप लगने शुरू हो गए। आयकर और प्रवर्तन निदेशालय जैसी सरकारी एजेंसियां बाबा रामदेव के पीछे पड़ गई हैं। कांग्रेस सरकार ने बाबा पर नित नए आरोप मढऩे शुरू कर दिए, क्योंकि बाबा ने सरकार में बैठे राष्ट्रद्रोहियों के विरुद्ध जाकर राष्ट्रहित में आवाज उठाई है। बाबा के विशाल जन समर्थन को देखकर बौखलाई सरकार ने जिस तरह से आंदोलन का दमन किया वह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दोनों तरह से अमर्यादित है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग ने स्वयं संज्ञान लेते हुए प्रथम द्रष्टया सरकार और पुलिस द्वारा अनशनकारियों पर की गई बर्बर कार्रवाई पर स्पष्टीकरण मांगा। आधी रात को सोते हुए निर्दोष बूढ़े, बच्चे और महिलाओं को लाठी से पीटना और उन्हें घसीटते हुए धरना स्थल से बाहर ले जाकर फेंकने की कार्रवाई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा उचित ठहराना कांग्रेस सरकार के खात्मे की उल्टी गिनती शुरू होने का संकेत है।
अन्ना हजारे की मांगों को मानने का आश्वासन देकर के सरकार ने उनका अनशन खत्म किया लेकिन बाद में वादाखिलाफी कर दी। उसी तरह का प्रयास बाबा के आंदोलन को खत्म करने के लिए हो रहा था, लेकिन बाबा ने अनशन समाप्त करने से इंकार कर सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया और आखिरकार सरकार ने पुलिसिया बल का सहारा लेकर आंदोलन को बल पूर्वक कुचल डाला। कपिल सिब्बल, प्रणब मुखर्जी, सुबोधकांत सहाय और पवन बंसल जैसे शातिर परिपक्व राजनीतिज्ञों के सामने योग गुरु की क्या बिसात थी। तभी तो कपिल सिब्बल ने अपनी शातिराना चालबाजी का परिचय देते हुए बाबा रामदेव के सत्याग्रह आंदोलन को तहस-नहस कर बाबा पर ही अपने समर्थकों के साथ धोखा करने का आरोप मढ़ कर सिर्फ योग सिखाने की सलाह दी और हिदायत दी कि वे राजनीति नहीं करें। जैसे राजनीति तो उन जैसे नेताओं की बपौती हो!
बाबा राम देव जबतक सिर्फ योग गुरु थे वे नेताओं के भी प्रिय थे लेकिन जब से उन्होंने भ्रष्टाचार और काले धन की वापसी की बात की तबसे वे सरकार की आंख में कांटे की तरह चुभने लगे। उन पर ठग, धोखेबाज, जालसाज होने के आरोप लगने शुरू हो गए। आयकर और प्रवर्तन निदेशालय जैसी सरकारी एजेंसियां बाबा रामदेव के पीछे पड़ गई हैं। कांग्रेस सरकार ने बाबा पर नित नए आरोप मढऩे शुरू कर दिए, क्योंकि बाबा ने सरकार में बैठे राष्ट्रद्रोहियों के विरुद्ध जाकर राष्ट्रहित में आवाज उठाई है। बाबा के विशाल जन समर्थन को देखकर बौखलाई सरकार ने जिस तरह से आंदोलन का दमन किया वह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दोनों तरह से अमर्यादित है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग ने स्वयं संज्ञान लेते हुए प्रथम द्रष्टया सरकार और पुलिस द्वारा अनशनकारियों पर की गई बर्बर कार्रवाई पर स्पष्टीकरण मांगा। आधी रात को सोते हुए निर्दोष बूढ़े, बच्चे और महिलाओं को लाठी से पीटना और उन्हें घसीटते हुए धरना स्थल से बाहर ले जाकर फेंकने की कार्रवाई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा उचित ठहराना कांग्रेस सरकार के खात्मे की उल्टी गिनती शुरू होने का संकेत है।
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