Thursday, October 4

भ्रष्टाचार पलट देगा कांग्रेस का आरक्षण-दांव!

संविधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने के पीछे संविधान निर्माताओं का उद्देश्य यह था कि समाज के अति पिछड़ों और दलितों का आर्थिक और सामाजिक विकास हो सके। संविधान निर्माण के छह दशक बाद भी आरक्षण का लाभ कुछ प्रतिशत सरकारी नौकरी करने वाले अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों को ही मिल रहा है बाकी लोग अभी भी गरीबी रेखा के नीचे भुखमरी की स्थिति में दिन गुजार रहे हैं। अमीरी और गरीबी की खाई अभी भी बहुत गहरी है और इस का सारा (कु)श्रेय देश के सभी राजनीतिक दलों को जाता है। वे इस खाई को पाटने की बजाए इसे और चौड़ा करने में लगे हैं। आजादी के बाद लगातार आरक्षण को लेकर राजनीति हो रही है। दलितों और पिछड़ों को मूलभूत सुविधाएं जैसे मुफ्त और उचित शिक्षा देकर जमीनी स्तर से उनका उत्थान करने के बजाए हमारे नेता आरक्षण को मुद्ïदा बनाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। राजनीतिक दल अगर पिछड़ों और दलितों के विकास को लेकर चिंतित होने लगे, तो उनको विकास कार्य के लिए सरकारी खजाने का मुंह स्विस बैंक के अपने खातों के बजाय जनता के लिए खोलना होगा। लेकिन ऐसे में बेचारे नेतागण अपनी जेब कैसे भर पाएंगे? 'हींग लगे न फिटकिरी, रंग चोखा आएÓ इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए राजनीतिक दलों ने आरक्षण के मुद्ïदे को हमेशा से किसी न किसी रूप में जीवित रखा है।  
अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को नौकरी में पहले से ही आरक्षण मिल रहा है अब तो मुद्ïदा प्रोन्नति में आरक्षण देने का है। प्रोन्नति में आरक्षण देने के बाद तो अब रिटायरमेन्ट और पेन्शन में भी आरक्षण का मुद्ïदा सामने आने वाला है। इसका भी इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां आने वाले दिनों मेें जरूर करेंगी। सवर्णों के रिटायरमेन्ट की आयु साठ साल है तो दलितों की पैंसठ साल होनी चाहिए। पेंशन मेें भी आरक्षण का घुसपैठ इन नेताओं द्वारा सम्भव है। राजनीतिक पार्टियां अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। भाजपा को साम्प्रदायिक पार्टी कह कर राजनीति करने वाली तथाकथित सेकुलर पार्टियां जाति के आधार पर लोगों को बांटने में लगी हैं।
अनुसूचित जाति और जनजाति के सरकारी कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने का मुद्ïदा उठाकर, इस चिंगारी को हवा बसपा सुप्रीमो मायावती ने दी थी, इसे सुलगा कांग्रेस पार्टी रही है और इसमें भस्म देश की जनता होने वाली है। इसकी शुरुआत संसद से हो चुकी है। इस मुद्ïदे को लेकर सपा सांसद नरेश अग्रवाल और बसपा के अवतार सिंह करीमपूरी आपस में हाथापाई पर उतर आए। आरक्षण समर्थक और विरोधियों के बीच टकराव के हालात बनने लगे हैं। दोनों पक्षों का धरना प्रदर्शन व गोष्ठियों का दौर शुरू हो गया है। देश की राजनीति गरमाने लगी है। टीवी चैनलों पर समर्थक और विरोधी नेताओं का वाकयुद्ध आरंभ हो चुका है और कांग्रेस पार्टी अपने कुटिल चाल में सफल हो चुकी है।
घोटालों में आकंठ डूबी कांग्रेस सरकार फिलहाल कोयला घोटाले मामले में बुरी तरह फंसती जा रही थी। इस घोटाले से लोगों का घ्यान हटाने के लिए सरकार ने प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्ïदे को हवा दे दी और उसका त्वरित परिणाम भी सामने आ गया विपक्ष, मीडिया व जनता का ध्यान कोयला घोटाले से हटकर अब आरक्षण के मुद्ïदे पर केंद्रित हो गया है। अभी तो केंद्रीय मंत्रीमंडल ने इस विधेयक को मंजूरी दी है। राज्य सभा में विधेयक पेश किया पर पारित नहीं हो सका। इस मानसून सत्र में संसद से इस विधेयक को मंजूरी मिलना नामुमकिन है, लेकिन कांग्रेस ने विधेयक को मंजूरी देकर इस विवाद को अगले सत्र तक सुलगते रहने के लिए चिंगारी में ऑक्सीजन तो दे ही दिया है। अभी कई ऐसे मुद्ïदे हैं जिस पर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा होना पड़ सकता है। शायद प्रोन्नति में आरक्षण के  सुलगते मामले के बीच ही सरकार पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी कर दे ताकि ध्यान बंटा रहने के कारण जनता का रोष कम झेलना पड़े। कांग्रेस चाहे कितनी भी चालबाजियां कर ले, जनता और विपक्षी दल को यह पता है कि इस बार के लोक सभा चुनाव मेें कांग्रेस को करारी हार झेलनी होगी। इसी के मद्ïदेनजर राजनीतिक पार्टियां किसी भी मुद्ïदे को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती है।
कोई भी राजनीतिक दल जनता के हित के लिए किसी मुद्ïदे पर अपना विरोध या समर्थन नहीं देती बल्कि उसका मकसद तो अपनी राजनीति की दुकानदारी चलाने भर से है।  जहां तक सपा का सवाल है वह प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ है। पूर्ववर्ती मायावती सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजातियों को सरकारी नौकरी मेें प्रोन्नति में आरक्षण देने का ऐलान किया तो समाजवादी पार्टी ने इसका पुरजोर विरोध किया था। जिसका लाभ सपा को विधान सभा चुनाव में मिला और सपा भारी बहुमत से चुनाव जीतकर सत्ता में आई। इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण के बसपाई फार्मूले को खारिज कर दिया और सुप्रीमकोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अपनी स्वीकृति दे दी। भारी बहुमत से चुनाव जीत कर सत्ता में आई समाजवादी पार्टी ने लोक सभा चुनाव को ध्यान में रख कर फौरन बसपा सरकार के फैसले को रदï्ïद कर दिया और प्रमोशन में आरक्षण को न्याय विरोधी करार दे दिया। सपा की सरकार आरक्षण का विरोध इसलिए कर रही है कि इससे उनके जनसमर्थन पर कोई खास असर पडऩे वाला नहीं है। सपा का असली वोट बैंक तो मुस्लिम और ओबीसी है और इन दोनों  समुदायों को इस आरक्षण में शामिल नहीं किया गया है। अगर मुस्लिम और ओबीसी को आरक्षण में शामिल किया जाता तो सपा इसका विरोध नहीें कर पाती। उत्तरप्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी जहां २१ प्रतिशत है वहीं ओबीसी की संख्या ४५ प्रतिशत से ज्यादा है। सवर्ण और अल्पसंख्यक मतदाता भी इस आरक्षण के खिलाफ हैं। आरक्षण का विरोध कर सपा ने सवर्णों को भी अपने पक्ष मेें खड़ा कर लिया है। इस मुद्ïदे पर अगामी लोक सभा चुनाव मेें इसका सबसे ज्यादा लाभ सपा को ही होने जा रहा है।
जहां तक मायावती का सवाल है, तो दलित की बेटी के नाम से जानी जाने वाली बसपा सुप्रीमो का उत्तर प्रदेश में दलितों (खास कर एक समुदाय विशेष) का समर्थन इतना मजबूत है कि उसे कोई भी पार्टी आसानी से हिला नहीं सकती। इन समर्थकों का विश्वास कायम रखने के लिए मायावती जल्द से जल्द इस विधेयक को संसद से पास कराना चाह रही हैं। इसीलिए उन्होंने विशेष सत्र बुलाने की मांग की है ताकि जल्द से जल्द इस विधेयक को पारित कराकर इसका श्रेय खुद ले सकें। कांग्रेस भी इसका
श्रेय मायावती को नहीं देना चाह रही है तभी तो सलमान खुर्शीद ने कहा कि सरकार यह विधेयक मायावती के लिए नहीं लाई है। कांग्रेस कितना भी हाथ पांव मार ले अगर यह विधेयक संसद से पारित हुआ तो इसका सारा श्रेय मायावती ही ले जाएगी क्योंकि कांग्रेस से लोगों का विश्वास उठ चुका है।
कोयला घोटाले को लेकर संसद नहीं चलने देने वाली प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा इस मुद्ïदे पर चुप्पी साधे है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से इस मामले में किसी तरह की स्पष्ट टिप्पणी नहीं आई है। कोयला घोटाले को लेकर सरकार पर बिफरी भाजपा इस मामले को लेकर इतनी गम्भीर थी कि एकाएक आरक्षण का मामला सामने आ जाने से शायद वह समझ नहीं पा रही है कि इस मसले पर उसे क्या कदम उठाना है। भाजपा को साम्प्रदायिक पार्टी कहा जाता है। उसे न तो मुसलमानों का समर्थन है और न ही दलितों का। ऐसे में सवर्ण और ओबीसी बचे। अगर भाजपा प्रमोशन में आरक्षण का समर्थन करती है तो उससे सवर्ण और ओबीसी भी दूरी बना लेंगे। ऐसे में भाजपा को इस मुद्ïदे पर सोच समझकर ही कदम उठाना चाहिए। कांग्रेस सरकार से बुरी तरह उब चुकी जनता के सामने विकल्प के रूप मेें भाजपा है। अगर अभी उसने सही कदम नहीं उठाए तो तीसरे मोर्चे का बनना तय हो जाएगा और शायद मुलायम सिंह का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी साकार हो जाए।
प्रोन्नति में आरक्षण का दूरगामी परिणाम चाहे जो हो फिलहाल अगामी लोकसभा चुनाव के मद्ïदेनजर देश की राजनीति में गरमाहट आ गई है। बस देखना यह है कि राजनीतिक पाटियां इसका लाभ किस तरह उठाती हैं और देश के मतदाता उनके हाथों किस तरह कठपुतली बनते हैं। आगामी चुनाव में भ्रष्टाचार, काला धन और महंगाई का मुद्दा भूल कर देश की जनता आरक्षण जैसे बेमानी मसलों में बंटी तो देश के राजनीतिक भविष्य के बारे में अभी से ही आकलन कर लिया जा सकता है। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि आरक्षण का पत्ता केवल कोयला घोटाले से मतदाताओं का ध्यान हटाने के लिए नहीं किया गया, बल्कि एक चाल से कांग्रेस ने अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आह्वान पर एकजुट होते लोगों और उस आधारभूत मुद्दे पर बाबा रामदेव के साथ एकजुट होते दिख रहे तमाम राजनीतिक दलों को एक झटके में अप्रासंगिक बना दिया। अगर मतदाताओं ने कांग्रेस का यह कुचक्र याद रखा तो लोकसभा चुनाव में एकबारगी कांग्रेस का पासा पलट भी सकता है।

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