Friday, October 5

आतंक-धर्म में फंसा मध्य-पूर्व


लीबिया में फिल्म 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम' को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन की चिंगारी अब दुनियाभर में फैल रही है। एशिया, अफ्रीका के बाद यूरोप के कई देशों में अमेरिकी दूतावासों को निशाना बनाया जा रहा है। यह विरोध इस फिल्म की आड़ में इस्लामिक देशों का अमेरिका के प्रति अंदर ही अंदर सुलगती नफरत और नाराजगी का नतीजा प्रतीत होता है। मध्य पूïर्व और अफ्रीकी देशों में बाहरी हस्तक्षेप से शासन बदलने की अमेरिका की नीति कहीं इन हमलों की वजह है या लीबिया में सक्रिय अलकायदा समर्थित आतंकी संगठन ने इस कृत्य को अंजाम दिया है, यह गहरी समीक्षा का विषय है। इन सारे मुद्दे पर अमेरिका और उसके समर्थक देशों को मंथन करने की आवश्यकता है।
उल्लेखनीय है कि लीबिया के बेनगाजी शहर में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले में राजदूत क्रिस्टोफर स्टीवंस समेत चार लोग मारे गए थे। यह हमला 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम' नामक  फिल्म में इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद का अपमान किए जाने के विरोध में किया गया था। इजराइली मूल के अमेरिकी नागरिक सैम बेसाइल ने ५० लाख डॉलर खर्च करके इस फिल्म को बनाया था तथा इस फिल्म को बनाने के लिए सौ यहूदियों ने आर्थिक मदद की थी। इस फिल्म के निर्माण में अमेरिकी पादरी टेरी जोंस की भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है जिसने पिछले साल ९/११ की बरसी पर पवित्र कुरान की प्रतियां जलाने की घोषणा की थी।
अमेरिकी दूतावास पर हमला और राजदूत स्टीवेंस की हत्या एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ प्रतीत होता है। गौरतलब है कि यह हत्या अमेरिका पर ९/११ को हुए हमले की बरसी पर हुआ। इसी दिन मिस्र में भी अमेरिकी दूतावास पर हमला हुआ तथा अमेरिकी झंडे को आग लगा दी गई। सोचने वाली बात यह है कि इस्लामिक देशों में अमेरिका के प्रति फूटता गुस्सा क्या सिर्फ इस फिल्म को लेकर है या यह पहले से ही सुलग रहा था, जिसे इस फिल्म ने हवा दे दी है। इराक, अफगानिस्तान, ट्यूनीशिया, लीबिया और अब सीरिया में तानाशाह सत्ताधीशों को अपदस्थ कर लोकतंत्र की बहाली के बहाने, सत्ता परिवर्तन करने की अमेरिकी नीति व इन देशों पर उसका अनधिकृत हस्तक्षेप से मुस्लमानों में अमेरिका के प्रति पहले से ही जबदस्त नाराजगी और गुस्सा था उसपर फिल्म के जरिए मुहम्मद साहब के किए गए अपमान ने आग में घी का काम किया जिसका परिणाम दुनिया भर में हो रहे अमेरिकी दूतावासों और कूटनीतिक महत्व के अन्य ठिकानों पर हमले के रूप में सामने है। 
मध्य पूर्व के देशों की राजनीति पर अमेरिका की नजर हमेशा से रही है। प्राकृतिक संसाधानों में सबसे बहुमूल्य तेल को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की रुचि मध्य पूर्व के देशों में रही है। जिन देशों ने अमेरिका की शर्तों पर चलने से इंकार किया उसे अमेरिका ने बरबाद कर दिया या करने की कोशिश में लगा है। इसके लिए सिर्फ अमेरिका ही जिम्मेदार नहीं है। इस्लामिक देशों के तानाशाही रवैये ने भी अमेरिका को हस्तक्षेप का मौका दिया है। 'ऑरगेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़' (ओपेक) का गिरोह बना कर कभी शेष विश्व को दबाव में रखने की कोशिश की गई तो कभी 'इस्लामिक बम' के नाम पर दुनिया को डराने की बेजा हरकतें हुईं। धमकी और आपराधिक-आतंकी ताकत के बूते इस्लामिक देशों ने दुनिया पर धाक जमाने की नापाक कोशिशें कीं। दुनियाभर में ड्रग सिंडिकेट को बढ़ावा दिया। आपस में इन देशों के ७२ छेद हैं। कभी इराक ने कुवैत पर दखल जमाने की कोशिश की तो कभी ईरान ने इराक को देख लेने की धमकी दी, तो कभी मिश्र का मामला उठा तो कभी ट्यूनिशिया का। कभी पाकिस्तान-अफगानिस्तान तो कभी फिलस्तीन-इजराइल तो कभी सीरिया का मसला उठता रहा। ऐसे में बाहरी हस्तक्षेप की सारी संभावनाएं खुद खड़ी होती चली गईं। रूस इन्ही वजहों से अफगानिस्तान में घुसा था। तब अमेरिका उन्हीं तालिबानों का समर्थन कर रहा था जिनसे आज खुद लड़ रहा है। फिर आतंकवाद के सहारे इस्लामिक विश्व कायम करने की हरकतों ने पूरी दुनिया को इस्लामिक देशों के खिलाफ कर दिया, और इन्हें साधने का अमेरिका को मौका मिल गया। अमेरिका ने खुद पर खतरा आने के बाद यह फैसला किया और इसका खामियाजा मध्य पूर्व के देशों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि इसका परिणाम अमेरिका और उसके समर्थक देशों को भी झेलना पड़ रहा है, लेकिन आर्थिक हानि की भरपाई वे उन देशों से लिए जा रहे तेल से पूरी कर रहे हैं।
इराक और अफगानिस्तान के बाद तेल मामले में सबसे धनी लीबिया में भी ऐसा ही हुआ। लीबिया के शासक कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने भी पश्चिम को काफी उकसाया। आखिरकार गद्दाफी का तख्ता पलट अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के सैनिक हस्तक्षेप से हो गया। उसके पहले खुद लीबियाइयों ने ही जन विद्रोह के बहाने या जरिए गद्दाफी को निबटा दिया। बिना आंतरिक व्यवस्था विकसित हुए सत्ता के इस बदलाव ने देश के कई इलाकों में अराजकता की स्थिति बना दी। तब से कई चरमपंथी गुट बिना किसी नियन्त्रण के अलग-अलग इलाकों में अपना सिक्का चला रहे हैं। उसी का नतीजा एक भीड़ के हमले में राजदूत क्रिटोफर स्टीवंस की मौत है क्योंकि जब बेनगाजी में विरोध भड़का तो उसे नियंत्रित करने के लिए वहां कोई सरकारी मशीनरी नहींथी। इनका उग्र होना भी अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि गद्दाफी विरोधी लड़ाई के दिनों में यह खबर आती रही कि वहां इस्लामी चरमपंथी अपनी जड़ें गहरी कर रहे हैं। तब अमेरिका ने  इन्हीं भाड़े के आतंकवादियों को क्रांतिकारी बता कर उनकी सहायता की थी और तख्ता पलट किया था। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस हमले को अलकायदा समर्थक चरमपंथी लीबियाई समूह ने रचा हो।
लीबिया के बाद अब सीरिया अमेरिका के निशाने पर है। वहां भी पश्चिम देश बाहरी हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे है। वहां भी राष्ट्रपति बसर-अल-असद विरोधी गुट पर जिहादियों का वर्चस्व हो गया है। जिनका मकसद सिर्फ सीरिया में सत्ता बदलना ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इस्लामी राज्य कायम करना है। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद ओसामा समर्थित मुस्लिम समुदाय में जबदस्त गुस्सा है जिसका प्रस्फुटन अमेरिकी दूतावास पर हमले के रूप में हुआ, इस दृष्टिकोण से भी प्रकरण को देखा जा सकता है। इस्लामिक देशों में तेज हुआ अमेरिका विरोध इजराइल का हित साध सकता है, क्योंकि इजराइल यह जरूर चाहेगा कि नाटो समर्थक देशों का गुस्सा निर्णायक रूप से सामने आए तो आखिरकार उसका भौगोलिक लाभ और भौतिक फायदा दोनों ही इजराइल को मिल सकता है।
लीबिया में अमेरिकी दूतावास पर हमले का मामला हो या इस्लाम विरोधी फिल्म के प्रदर्शन का, इस घटना पर पूरे विश्व में कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी को भी ऐसी फिल्म बनाने की आजादी नहीं दी जा सकती जिससे लोगों की घार्मिक भावनाओं पर आघात पहुंचता हो। लोगों की आस्था का भरपूर सम्मान होना चाहिए जिससे साम्प्रदायिक सद्भावना पर किसी प्रकार की कोई आंच न आए और भावनाएं आहत न हों। इस्लाम विरोधी फिल्म का निर्माण और उसकी प्रतिक्रिया में हिंसक घटनाएं दोनों ही निन्दनीय हैं। इस तरह की घटना दुबारा न हो इसके लिए उन लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए जो इसमें लिप्त हों। पूरी दुनिया में शांति और सद्भावना बनाए रखने के लिए ऐसी घटनाओं पर रोक लगनी चाहिए कोई भी धर्म हिंसा और वैमनस्य का पाठ नहीं पढ़ाता। ऐसा कृत्य करने वाले धर्म विरोधी होते हैं। ऐसे उपद्रवियों का दमन जरूरी है जो दुनिया के लिए खतरा हैं।
 

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