Friday, March 27

ताज अपनी चमक को मोहताज

विश्व प्रसिद्ध ताज महल एक बार फिर से चर्चा में है। इस बार कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि मसला इसकी फीकी पड़ती खूबसूरती को लेकर चिंता का है। अभी हाल ही में संसद में इस मामले पर चिंता जताई गई और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग व उत्तर प्रदेश सरकार को इस मुद्दे पर वास्तविक स्थिति की जानकारी देने को कहा गया। मामले को गंभीरता से लेते हुए विशेषज्ञों का दल नियुक्त कर इसकी जांच करने की भी जरूरत महसूस की गई। ताजमहल के संरक्षण से जुड़े केंद्रीय पर्यावरण सचिव के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने भी पर्यावरण संबंधी स्थायी संसदीय समिति के सामने स्वीकार किया कि ताज पर प्रदूषण का असर काफी दिख रहा है। ताज महल की फीकी पड़ती चमक और संरक्षण को लेकर वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं और इस धरोहर की चमक कम करने वाले खतरों से सरकार को अगाह भी किया जाता रहा है, बावजूद इसके इस वैश्विक धरोहर की रक्षा के लिए कोई ठोस और स्थाई कदम अभी तक नहीं उठाया जा सका है।
शिल्प कला का बेजोड़ नमूना ताज धीरे-धीरे अपनी खूबसूरती ओर चमक खोता जा रहा है। लगभग चार दशक पहले ही 1970 की शुरुआत में पर्यवक्षकों को ताजमहल की चमक कम होने का आभास हो गया था। इसकी चमक खोने का कारण जानने में लगे वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने ताजमहल की फीकी पड़ रही दूधिया चमक की वजह कार्बन और धूलकण बताया। अभी हाल ही में भारत और अमेरिका के शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रदूषण की वजह से संगमरमर से बने ताजमहल का रंग पीला पड़ता जा रहा है। जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर माइकल बर्गिन और उनकी टीम यह पता लगाने में सफल रही कि ताजमहल की चमक को फीका करने वाले प्रदूषित तत्व जैव ईंधन, अपशिष्ट, जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन कण और धूल कण हैं। इस अध्ययन में आईआईटी कानपुर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और विस्कोंसिन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने ताजमहल की चमक के फीका पड़ने की वजह जानने के लिए हवा के नमूनों की जांच करने वाले उपकरणों का प्रयोग किया। इन उपकरणों को ताजमहल के कई स्थानों पर रखा गया और संगमरमर के नमूने लिए गए। उन्हें उपकरण के फिल्टर में और संगमरमर नमूनों पर भूरे ऑर्गेनिक कार्बन और काले कार्बन के कण मिले। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ताजमहल के हल्के पीलेपन की वजह लाखों की संख्या में आने वाले दर्शकों की सांस से निकलने वाली कार्बन डाईआक्साइड गैस भी हो सकती है। वैसे इस मामले की जांच नेशनल इन्वायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरई) द्वारा कराई जा रही है। इसके अलावा यमुना का सूखना भी मुख्य कारण माना जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों का कहना है कि वातावरण में रेत के कण सामान्य से बहुत ज्यादा हैं लेकिन यदि यमुना में पर्याप्त पानी हो तो वायु में इनकी मात्रा कम हो सकती है। ताजमहल को सूखी और प्रदूषित यमुना से खतरे का अंदेशा पहले भी जताया जाता रहा है। इतिहासकार इरफ़ान हबीब का मानना है कि ताजमहल के पीछे से बहने वाली यमुना ही ताजमहल की सुरक्षा की गारंटी है। उसमें जल स्तर हर हाल में बरकरार रहना चाहिए। वरदराजन समिति ने कहा था कि ताजमहल के आसपास की परिस्थतियों से किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।
छुट्टी और सप्ताहांतों में होने वाले पर्यटकों की भारी भीड़ भी ताज को क्षति पंहुचा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो इस तरह की अनियंत्रित और गैर अनुशासित भीड़ जो वहां के नियमों का पालन नहीं करते हुए अपनी मनमानी करती है, उससे भी ताज को भारी नुकसान पहुंच रहा है। रोजाना हजारों की संख्या में आने वाले सैलानी अपने हाथों से ताज की दीवार को रगड़ते और खुरचते हैं, जिससे ताज की चमक फीकी पड़ रही है। संगमरमर पर उभरे बदरंग धब्बों को देखकर ऐसा लगता है कि ताजमहल की खूबसूरती खत्म होने की शुरुआत हो गई है। यदि यह सिलसिला जारी रहा तो ताज की चमक हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।   
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के लोग भी समय-समय पर ताजमहल में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत करा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन दूषित पर्यावरण से होने वाली हानि को दूर करने का उपाय तलाशने में वे कतई सचेष्ट नहीं होते। कुछ अर्सा पहले पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने प्रतिदिन पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण धंसते जा रहे स्मारक और ताज की घिसती सीढ़ियों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने स्मारक की सैर करने वाले सैलानियों की ताज में ठहरने की अवधि कम करने का प्रस्ताव दिल्ली मुख्यालय को भेजा था लेकिन इस पर अभी तक किसी भी तरह का निर्णय नहीं लिया गया। ताज में उर्स के दौरान उमड़ने वाली सर्वाधिक भीड़ और गर्मियों में घटती पर्यटकों की संख्या के समय वातावरण में मौजूद गैसों के सैंपल लिए गए हैं। ताज के गुंबद पर लोगों की तादाद और उससे ताजमहल पर पड़ने वाले असर का ब्यौरा भी जमा किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ताजमहल के मुख्य गुंबद पर जाने वाले पर्यटकों की संख्या निर्धारित की जाएगी। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत धीमी चाल से चल रही है। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने ताज में बढ़ते सैलानियों की संख्या देखते हुए दबाव कम करने का मन बनाया है। इस बारे में मुख्यालय को एक प्रस्ताव भेजा गया है, जिसमें सलाह दी गई है कि मुख्य गुंबद पर एक समय में सैलानियों की संख्या निर्धारित कर दी जाए। बीते साल 80 लाख से अधिक देसी सैलानी ताजमहल देखने आए। इससे पहले के वर्षों में यह संख्या 30 से 35 लाख तक हुआ करती थी।
ताज के मुख्य गुंबद के भार उठाने की क्षमता का भी आकलन किया जा रहा है। एएसआई के एक अधिकारी ने ताज की नींव कमजोर होने को लेकर उठ रहे सवालों के बारे में कहा कि कुछ वर्षों पहले ही नींव में दरार पड़ने की घटना सामने आई थी लेकिन उसकी मरम्मत कर ली गई थी। ताज महल की देखरेख की जिम्मेदारी संभालने वाले पुरातत्व विभाग की लापरवाही और उत्तर प्रदेश प्रशासन की कुव्यवस्था भी ताज को बहुत नुकसान पहुंचा रही है। पुरातत्व विभाग और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच खींचतान और बेवजह की सियासत भी ताज के लिए हानिकारक है। ताजमहल में मक़बरे के ऊपर बनी एक मीनार के तीन इंच झुकने की बात कही गई थी, लेकिन पुरातत्व विभाग इन ख़बरों को गलत बताता है। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बना कर इसे राजनीतिक रंग देने की पूरी कोशिश की थी। पुरातत्व विभाग का कहना है कि ताज की देखरेख उसके जिम्मे है तब उत्तर प्रदेश सरकार इसकी जांच के लिए समिति कैसे बना सकती है।

Friday, October 5

आतंक-धर्म में फंसा मध्य-पूर्व


लीबिया में फिल्म 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम' को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन की चिंगारी अब दुनियाभर में फैल रही है। एशिया, अफ्रीका के बाद यूरोप के कई देशों में अमेरिकी दूतावासों को निशाना बनाया जा रहा है। यह विरोध इस फिल्म की आड़ में इस्लामिक देशों का अमेरिका के प्रति अंदर ही अंदर सुलगती नफरत और नाराजगी का नतीजा प्रतीत होता है। मध्य पूïर्व और अफ्रीकी देशों में बाहरी हस्तक्षेप से शासन बदलने की अमेरिका की नीति कहीं इन हमलों की वजह है या लीबिया में सक्रिय अलकायदा समर्थित आतंकी संगठन ने इस कृत्य को अंजाम दिया है, यह गहरी समीक्षा का विषय है। इन सारे मुद्दे पर अमेरिका और उसके समर्थक देशों को मंथन करने की आवश्यकता है।
उल्लेखनीय है कि लीबिया के बेनगाजी शहर में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले में राजदूत क्रिस्टोफर स्टीवंस समेत चार लोग मारे गए थे। यह हमला 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम' नामक  फिल्म में इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद का अपमान किए जाने के विरोध में किया गया था। इजराइली मूल के अमेरिकी नागरिक सैम बेसाइल ने ५० लाख डॉलर खर्च करके इस फिल्म को बनाया था तथा इस फिल्म को बनाने के लिए सौ यहूदियों ने आर्थिक मदद की थी। इस फिल्म के निर्माण में अमेरिकी पादरी टेरी जोंस की भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है जिसने पिछले साल ९/११ की बरसी पर पवित्र कुरान की प्रतियां जलाने की घोषणा की थी।
अमेरिकी दूतावास पर हमला और राजदूत स्टीवेंस की हत्या एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ प्रतीत होता है। गौरतलब है कि यह हत्या अमेरिका पर ९/११ को हुए हमले की बरसी पर हुआ। इसी दिन मिस्र में भी अमेरिकी दूतावास पर हमला हुआ तथा अमेरिकी झंडे को आग लगा दी गई। सोचने वाली बात यह है कि इस्लामिक देशों में अमेरिका के प्रति फूटता गुस्सा क्या सिर्फ इस फिल्म को लेकर है या यह पहले से ही सुलग रहा था, जिसे इस फिल्म ने हवा दे दी है। इराक, अफगानिस्तान, ट्यूनीशिया, लीबिया और अब सीरिया में तानाशाह सत्ताधीशों को अपदस्थ कर लोकतंत्र की बहाली के बहाने, सत्ता परिवर्तन करने की अमेरिकी नीति व इन देशों पर उसका अनधिकृत हस्तक्षेप से मुस्लमानों में अमेरिका के प्रति पहले से ही जबदस्त नाराजगी और गुस्सा था उसपर फिल्म के जरिए मुहम्मद साहब के किए गए अपमान ने आग में घी का काम किया जिसका परिणाम दुनिया भर में हो रहे अमेरिकी दूतावासों और कूटनीतिक महत्व के अन्य ठिकानों पर हमले के रूप में सामने है। 
मध्य पूर्व के देशों की राजनीति पर अमेरिका की नजर हमेशा से रही है। प्राकृतिक संसाधानों में सबसे बहुमूल्य तेल को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की रुचि मध्य पूर्व के देशों में रही है। जिन देशों ने अमेरिका की शर्तों पर चलने से इंकार किया उसे अमेरिका ने बरबाद कर दिया या करने की कोशिश में लगा है। इसके लिए सिर्फ अमेरिका ही जिम्मेदार नहीं है। इस्लामिक देशों के तानाशाही रवैये ने भी अमेरिका को हस्तक्षेप का मौका दिया है। 'ऑरगेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़' (ओपेक) का गिरोह बना कर कभी शेष विश्व को दबाव में रखने की कोशिश की गई तो कभी 'इस्लामिक बम' के नाम पर दुनिया को डराने की बेजा हरकतें हुईं। धमकी और आपराधिक-आतंकी ताकत के बूते इस्लामिक देशों ने दुनिया पर धाक जमाने की नापाक कोशिशें कीं। दुनियाभर में ड्रग सिंडिकेट को बढ़ावा दिया। आपस में इन देशों के ७२ छेद हैं। कभी इराक ने कुवैत पर दखल जमाने की कोशिश की तो कभी ईरान ने इराक को देख लेने की धमकी दी, तो कभी मिश्र का मामला उठा तो कभी ट्यूनिशिया का। कभी पाकिस्तान-अफगानिस्तान तो कभी फिलस्तीन-इजराइल तो कभी सीरिया का मसला उठता रहा। ऐसे में बाहरी हस्तक्षेप की सारी संभावनाएं खुद खड़ी होती चली गईं। रूस इन्ही वजहों से अफगानिस्तान में घुसा था। तब अमेरिका उन्हीं तालिबानों का समर्थन कर रहा था जिनसे आज खुद लड़ रहा है। फिर आतंकवाद के सहारे इस्लामिक विश्व कायम करने की हरकतों ने पूरी दुनिया को इस्लामिक देशों के खिलाफ कर दिया, और इन्हें साधने का अमेरिका को मौका मिल गया। अमेरिका ने खुद पर खतरा आने के बाद यह फैसला किया और इसका खामियाजा मध्य पूर्व के देशों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि इसका परिणाम अमेरिका और उसके समर्थक देशों को भी झेलना पड़ रहा है, लेकिन आर्थिक हानि की भरपाई वे उन देशों से लिए जा रहे तेल से पूरी कर रहे हैं।
इराक और अफगानिस्तान के बाद तेल मामले में सबसे धनी लीबिया में भी ऐसा ही हुआ। लीबिया के शासक कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने भी पश्चिम को काफी उकसाया। आखिरकार गद्दाफी का तख्ता पलट अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के सैनिक हस्तक्षेप से हो गया। उसके पहले खुद लीबियाइयों ने ही जन विद्रोह के बहाने या जरिए गद्दाफी को निबटा दिया। बिना आंतरिक व्यवस्था विकसित हुए सत्ता के इस बदलाव ने देश के कई इलाकों में अराजकता की स्थिति बना दी। तब से कई चरमपंथी गुट बिना किसी नियन्त्रण के अलग-अलग इलाकों में अपना सिक्का चला रहे हैं। उसी का नतीजा एक भीड़ के हमले में राजदूत क्रिटोफर स्टीवंस की मौत है क्योंकि जब बेनगाजी में विरोध भड़का तो उसे नियंत्रित करने के लिए वहां कोई सरकारी मशीनरी नहींथी। इनका उग्र होना भी अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि गद्दाफी विरोधी लड़ाई के दिनों में यह खबर आती रही कि वहां इस्लामी चरमपंथी अपनी जड़ें गहरी कर रहे हैं। तब अमेरिका ने  इन्हीं भाड़े के आतंकवादियों को क्रांतिकारी बता कर उनकी सहायता की थी और तख्ता पलट किया था। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस हमले को अलकायदा समर्थक चरमपंथी लीबियाई समूह ने रचा हो।
लीबिया के बाद अब सीरिया अमेरिका के निशाने पर है। वहां भी पश्चिम देश बाहरी हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे है। वहां भी राष्ट्रपति बसर-अल-असद विरोधी गुट पर जिहादियों का वर्चस्व हो गया है। जिनका मकसद सिर्फ सीरिया में सत्ता बदलना ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इस्लामी राज्य कायम करना है। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद ओसामा समर्थित मुस्लिम समुदाय में जबदस्त गुस्सा है जिसका प्रस्फुटन अमेरिकी दूतावास पर हमले के रूप में हुआ, इस दृष्टिकोण से भी प्रकरण को देखा जा सकता है। इस्लामिक देशों में तेज हुआ अमेरिका विरोध इजराइल का हित साध सकता है, क्योंकि इजराइल यह जरूर चाहेगा कि नाटो समर्थक देशों का गुस्सा निर्णायक रूप से सामने आए तो आखिरकार उसका भौगोलिक लाभ और भौतिक फायदा दोनों ही इजराइल को मिल सकता है।
लीबिया में अमेरिकी दूतावास पर हमले का मामला हो या इस्लाम विरोधी फिल्म के प्रदर्शन का, इस घटना पर पूरे विश्व में कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी को भी ऐसी फिल्म बनाने की आजादी नहीं दी जा सकती जिससे लोगों की घार्मिक भावनाओं पर आघात पहुंचता हो। लोगों की आस्था का भरपूर सम्मान होना चाहिए जिससे साम्प्रदायिक सद्भावना पर किसी प्रकार की कोई आंच न आए और भावनाएं आहत न हों। इस्लाम विरोधी फिल्म का निर्माण और उसकी प्रतिक्रिया में हिंसक घटनाएं दोनों ही निन्दनीय हैं। इस तरह की घटना दुबारा न हो इसके लिए उन लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए जो इसमें लिप्त हों। पूरी दुनिया में शांति और सद्भावना बनाए रखने के लिए ऐसी घटनाओं पर रोक लगनी चाहिए कोई भी धर्म हिंसा और वैमनस्य का पाठ नहीं पढ़ाता। ऐसा कृत्य करने वाले धर्म विरोधी होते हैं। ऐसे उपद्रवियों का दमन जरूरी है जो दुनिया के लिए खतरा हैं।
 

Thursday, October 4

भ्रष्टाचार पलट देगा कांग्रेस का आरक्षण-दांव!

संविधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने के पीछे संविधान निर्माताओं का उद्देश्य यह था कि समाज के अति पिछड़ों और दलितों का आर्थिक और सामाजिक विकास हो सके। संविधान निर्माण के छह दशक बाद भी आरक्षण का लाभ कुछ प्रतिशत सरकारी नौकरी करने वाले अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों को ही मिल रहा है बाकी लोग अभी भी गरीबी रेखा के नीचे भुखमरी की स्थिति में दिन गुजार रहे हैं। अमीरी और गरीबी की खाई अभी भी बहुत गहरी है और इस का सारा (कु)श्रेय देश के सभी राजनीतिक दलों को जाता है। वे इस खाई को पाटने की बजाए इसे और चौड़ा करने में लगे हैं। आजादी के बाद लगातार आरक्षण को लेकर राजनीति हो रही है। दलितों और पिछड़ों को मूलभूत सुविधाएं जैसे मुफ्त और उचित शिक्षा देकर जमीनी स्तर से उनका उत्थान करने के बजाए हमारे नेता आरक्षण को मुद्ïदा बनाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। राजनीतिक दल अगर पिछड़ों और दलितों के विकास को लेकर चिंतित होने लगे, तो उनको विकास कार्य के लिए सरकारी खजाने का मुंह स्विस बैंक के अपने खातों के बजाय जनता के लिए खोलना होगा। लेकिन ऐसे में बेचारे नेतागण अपनी जेब कैसे भर पाएंगे? 'हींग लगे न फिटकिरी, रंग चोखा आएÓ इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए राजनीतिक दलों ने आरक्षण के मुद्ïदे को हमेशा से किसी न किसी रूप में जीवित रखा है।  
अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को नौकरी में पहले से ही आरक्षण मिल रहा है अब तो मुद्ïदा प्रोन्नति में आरक्षण देने का है। प्रोन्नति में आरक्षण देने के बाद तो अब रिटायरमेन्ट और पेन्शन में भी आरक्षण का मुद्ïदा सामने आने वाला है। इसका भी इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां आने वाले दिनों मेें जरूर करेंगी। सवर्णों के रिटायरमेन्ट की आयु साठ साल है तो दलितों की पैंसठ साल होनी चाहिए। पेंशन मेें भी आरक्षण का घुसपैठ इन नेताओं द्वारा सम्भव है। राजनीतिक पार्टियां अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। भाजपा को साम्प्रदायिक पार्टी कह कर राजनीति करने वाली तथाकथित सेकुलर पार्टियां जाति के आधार पर लोगों को बांटने में लगी हैं।
अनुसूचित जाति और जनजाति के सरकारी कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने का मुद्ïदा उठाकर, इस चिंगारी को हवा बसपा सुप्रीमो मायावती ने दी थी, इसे सुलगा कांग्रेस पार्टी रही है और इसमें भस्म देश की जनता होने वाली है। इसकी शुरुआत संसद से हो चुकी है। इस मुद्ïदे को लेकर सपा सांसद नरेश अग्रवाल और बसपा के अवतार सिंह करीमपूरी आपस में हाथापाई पर उतर आए। आरक्षण समर्थक और विरोधियों के बीच टकराव के हालात बनने लगे हैं। दोनों पक्षों का धरना प्रदर्शन व गोष्ठियों का दौर शुरू हो गया है। देश की राजनीति गरमाने लगी है। टीवी चैनलों पर समर्थक और विरोधी नेताओं का वाकयुद्ध आरंभ हो चुका है और कांग्रेस पार्टी अपने कुटिल चाल में सफल हो चुकी है।
घोटालों में आकंठ डूबी कांग्रेस सरकार फिलहाल कोयला घोटाले मामले में बुरी तरह फंसती जा रही थी। इस घोटाले से लोगों का घ्यान हटाने के लिए सरकार ने प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्ïदे को हवा दे दी और उसका त्वरित परिणाम भी सामने आ गया विपक्ष, मीडिया व जनता का ध्यान कोयला घोटाले से हटकर अब आरक्षण के मुद्ïदे पर केंद्रित हो गया है। अभी तो केंद्रीय मंत्रीमंडल ने इस विधेयक को मंजूरी दी है। राज्य सभा में विधेयक पेश किया पर पारित नहीं हो सका। इस मानसून सत्र में संसद से इस विधेयक को मंजूरी मिलना नामुमकिन है, लेकिन कांग्रेस ने विधेयक को मंजूरी देकर इस विवाद को अगले सत्र तक सुलगते रहने के लिए चिंगारी में ऑक्सीजन तो दे ही दिया है। अभी कई ऐसे मुद्ïदे हैं जिस पर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा होना पड़ सकता है। शायद प्रोन्नति में आरक्षण के  सुलगते मामले के बीच ही सरकार पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी कर दे ताकि ध्यान बंटा रहने के कारण जनता का रोष कम झेलना पड़े। कांग्रेस चाहे कितनी भी चालबाजियां कर ले, जनता और विपक्षी दल को यह पता है कि इस बार के लोक सभा चुनाव मेें कांग्रेस को करारी हार झेलनी होगी। इसी के मद्ïदेनजर राजनीतिक पार्टियां किसी भी मुद्ïदे को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती है।
कोई भी राजनीतिक दल जनता के हित के लिए किसी मुद्ïदे पर अपना विरोध या समर्थन नहीं देती बल्कि उसका मकसद तो अपनी राजनीति की दुकानदारी चलाने भर से है।  जहां तक सपा का सवाल है वह प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ है। पूर्ववर्ती मायावती सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजातियों को सरकारी नौकरी मेें प्रोन्नति में आरक्षण देने का ऐलान किया तो समाजवादी पार्टी ने इसका पुरजोर विरोध किया था। जिसका लाभ सपा को विधान सभा चुनाव में मिला और सपा भारी बहुमत से चुनाव जीतकर सत्ता में आई। इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण के बसपाई फार्मूले को खारिज कर दिया और सुप्रीमकोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अपनी स्वीकृति दे दी। भारी बहुमत से चुनाव जीत कर सत्ता में आई समाजवादी पार्टी ने लोक सभा चुनाव को ध्यान में रख कर फौरन बसपा सरकार के फैसले को रदï्ïद कर दिया और प्रमोशन में आरक्षण को न्याय विरोधी करार दे दिया। सपा की सरकार आरक्षण का विरोध इसलिए कर रही है कि इससे उनके जनसमर्थन पर कोई खास असर पडऩे वाला नहीं है। सपा का असली वोट बैंक तो मुस्लिम और ओबीसी है और इन दोनों  समुदायों को इस आरक्षण में शामिल नहीं किया गया है। अगर मुस्लिम और ओबीसी को आरक्षण में शामिल किया जाता तो सपा इसका विरोध नहीें कर पाती। उत्तरप्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी जहां २१ प्रतिशत है वहीं ओबीसी की संख्या ४५ प्रतिशत से ज्यादा है। सवर्ण और अल्पसंख्यक मतदाता भी इस आरक्षण के खिलाफ हैं। आरक्षण का विरोध कर सपा ने सवर्णों को भी अपने पक्ष मेें खड़ा कर लिया है। इस मुद्ïदे पर अगामी लोक सभा चुनाव मेें इसका सबसे ज्यादा लाभ सपा को ही होने जा रहा है।
जहां तक मायावती का सवाल है, तो दलित की बेटी के नाम से जानी जाने वाली बसपा सुप्रीमो का उत्तर प्रदेश में दलितों (खास कर एक समुदाय विशेष) का समर्थन इतना मजबूत है कि उसे कोई भी पार्टी आसानी से हिला नहीं सकती। इन समर्थकों का विश्वास कायम रखने के लिए मायावती जल्द से जल्द इस विधेयक को संसद से पास कराना चाह रही हैं। इसीलिए उन्होंने विशेष सत्र बुलाने की मांग की है ताकि जल्द से जल्द इस विधेयक को पारित कराकर इसका श्रेय खुद ले सकें। कांग्रेस भी इसका
श्रेय मायावती को नहीं देना चाह रही है तभी तो सलमान खुर्शीद ने कहा कि सरकार यह विधेयक मायावती के लिए नहीं लाई है। कांग्रेस कितना भी हाथ पांव मार ले अगर यह विधेयक संसद से पारित हुआ तो इसका सारा श्रेय मायावती ही ले जाएगी क्योंकि कांग्रेस से लोगों का विश्वास उठ चुका है।
कोयला घोटाले को लेकर संसद नहीं चलने देने वाली प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा इस मुद्ïदे पर चुप्पी साधे है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से इस मामले में किसी तरह की स्पष्ट टिप्पणी नहीं आई है। कोयला घोटाले को लेकर सरकार पर बिफरी भाजपा इस मामले को लेकर इतनी गम्भीर थी कि एकाएक आरक्षण का मामला सामने आ जाने से शायद वह समझ नहीं पा रही है कि इस मसले पर उसे क्या कदम उठाना है। भाजपा को साम्प्रदायिक पार्टी कहा जाता है। उसे न तो मुसलमानों का समर्थन है और न ही दलितों का। ऐसे में सवर्ण और ओबीसी बचे। अगर भाजपा प्रमोशन में आरक्षण का समर्थन करती है तो उससे सवर्ण और ओबीसी भी दूरी बना लेंगे। ऐसे में भाजपा को इस मुद्ïदे पर सोच समझकर ही कदम उठाना चाहिए। कांग्रेस सरकार से बुरी तरह उब चुकी जनता के सामने विकल्प के रूप मेें भाजपा है। अगर अभी उसने सही कदम नहीं उठाए तो तीसरे मोर्चे का बनना तय हो जाएगा और शायद मुलायम सिंह का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी साकार हो जाए।
प्रोन्नति में आरक्षण का दूरगामी परिणाम चाहे जो हो फिलहाल अगामी लोकसभा चुनाव के मद्ïदेनजर देश की राजनीति में गरमाहट आ गई है। बस देखना यह है कि राजनीतिक पाटियां इसका लाभ किस तरह उठाती हैं और देश के मतदाता उनके हाथों किस तरह कठपुतली बनते हैं। आगामी चुनाव में भ्रष्टाचार, काला धन और महंगाई का मुद्दा भूल कर देश की जनता आरक्षण जैसे बेमानी मसलों में बंटी तो देश के राजनीतिक भविष्य के बारे में अभी से ही आकलन कर लिया जा सकता है। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि आरक्षण का पत्ता केवल कोयला घोटाले से मतदाताओं का ध्यान हटाने के लिए नहीं किया गया, बल्कि एक चाल से कांग्रेस ने अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आह्वान पर एकजुट होते लोगों और उस आधारभूत मुद्दे पर बाबा रामदेव के साथ एकजुट होते दिख रहे तमाम राजनीतिक दलों को एक झटके में अप्रासंगिक बना दिया। अगर मतदाताओं ने कांग्रेस का यह कुचक्र याद रखा तो लोकसभा चुनाव में एकबारगी कांग्रेस का पासा पलट भी सकता है।

Wednesday, June 29

कांग्रेस की उलटी गिनती



बात अधिक दिन पुरानी नहीं है, अभी चार जून की रात को राम लीला मैदान में पुलिस ने जो बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की उसे कांग्रेस सरकार के बुरे दिनों की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है। बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में देश के कोने-कोने से आए उनके समर्थकों पर पुलिस द्वारा की गई अमानवीय, अनैतिक और पशुवत व्यवहार देश के समक्ष कांग्रेस सरकार की तानाशाही मानसिकता का प्रदर्शन था। बाबा के समर्थकों का दोष इतना भर था कि वे देश में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में शामिल थे। जनता देश में फैली महंगाई और भ्रष्टाचार से इतनी त्रस्त हो चुकी है कि ऐसे किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी नेतृत्व को खुले दिल से अपना समर्थन देने को तत्पर है जो इस त्रासदी से उन्हें निजात दिला सके। वो चाहे अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को जो अपार जन समर्थन मिला उसकी मुख्य वजह कांग्रेस सरकार के शासन काल में लगातार हुए घोटाले और असह्य महंगाई है। सरकारी तंत्र घोटाला कर राजकोष खाली करता रहा और इसका खमियाजा सरकार आम जनता पर महंगाई का बोझ डाल कर पूरा करती रही। राष्ट्रमंडल खेल और 2-जी स्पेट्रम घोटाले में सरकारी धन की जिस तरह लूट हुई है उससे सम्पूर्ण देश हतप्रभ है। और इस जन आक्रोश के लिए केंद्र सरकार का पाप जिम्मेदार है। यदि सरकार काले धन की वापसी और भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रति इतनी ही सजग और ईमानदार होती तो बाबा रामदेव और अन्ना हजारे को अनशन करने की जरूरत ही क्यों पड़ती?
अन्ना हजारे की मांगों को मानने का आश्वासन देकर के सरकार ने उनका अनशन खत्म किया लेकिन बाद में वादाखिलाफी कर दी। उसी तरह का प्रयास बाबा के आंदोलन को खत्म करने के लिए हो रहा था, लेकिन बाबा ने अनशन समाप्त करने से इंकार कर सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया और आखिरकार सरकार ने पुलिसिया बल का सहारा लेकर आंदोलन को बल पूर्वक कुचल डाला। कपिल सिब्बल, प्रणब मुखर्जी, सुबोधकांत सहाय और पवन बंसल जैसे शातिर परिपक्व राजनीतिज्ञों के सामने योग गुरु की क्या बिसात थी। तभी तो कपिल सिब्बल ने अपनी शातिराना चालबाजी का परिचय देते हुए बाबा रामदेव के सत्याग्रह आंदोलन को तहस-नहस कर बाबा पर ही अपने समर्थकों के साथ धोखा करने का आरोप मढ़ कर सिर्फ योग सिखाने की सलाह दी और हिदायत दी कि वे राजनीति नहीं करें। जैसे राजनीति तो उन जैसे नेताओं की बपौती हो!
बाबा राम देव जबतक सिर्फ योग गुरु थे वे नेताओं के भी प्रिय थे लेकिन जब से उन्होंने भ्रष्टाचार और काले धन की वापसी की बात की तबसे वे सरकार की आंख में कांटे की तरह चुभने लगे। उन पर ठग, धोखेबाज, जालसाज होने के आरोप लगने शुरू हो गए। आयकर और प्रवर्तन निदेशालय जैसी सरकारी एजेंसियां बाबा रामदेव के पीछे पड़ गई हैं। कांग्रेस सरकार ने बाबा पर नित नए आरोप मढऩे शुरू कर दिए, क्योंकि बाबा ने सरकार में बैठे राष्ट्रद्रोहियों के विरुद्ध जाकर राष्ट्रहित में आवाज उठाई है। बाबा के विशाल जन समर्थन को देखकर बौखलाई सरकार ने जिस तरह से आंदोलन का दमन किया वह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दोनों तरह से अमर्यादित है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग ने स्वयं संज्ञान लेते हुए प्रथम द्रष्टया सरकार और पुलिस द्वारा अनशनकारियों पर की गई बर्बर कार्रवाई पर स्पष्टीकरण मांगा। आधी रात को सोते हुए निर्दोष बूढ़े, बच्चे और महिलाओं को लाठी से पीटना और उन्हें घसीटते हुए धरना स्थल से बाहर ले जाकर फेंकने की कार्रवाई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा उचित ठहराना कांग्रेस सरकार के खात्मे की उल्टी गिनती शुरू होने का संकेत है।

Friday, October 1

कॉमन-वेल्थ 'लूट' गेम

सुबह-सुबह अखबार देखा तो पहले ही पेज पर खेल गांव में फैली कुव्यवस्था और गंदगी की पोल खोलती रिपोर्ट और तस्वीरें सामने थीं। इधर अखबारों में लगातार राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में होने वाले विलंब और भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं। इसमें नवनिर्मित फुट-ब्रिज का ढहना हो, खेलगांव में खिलाडिय़ों के लिए बनाए गए फ्लैट से सांप निकलने की घटना हो, फ्लैट में फैली गंदगी का मामला हो या आधी अधूरी तैयारी का। सरकार और आयोजन समिति की लचर नीति और आपसी समन्वय में कमी का ही नतीजा है कि चार साल का समय और हजारों करोड़ रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी तैयारी पूरी नहीं हो पायी। भारत जैसे विकासशील देश को राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन का अधिकार मिलना गौरव की बात है। ऐसे में भारत को विश्व के सामने अपनी क्षमता दिखाने का सुअवसर मिला था लेकिन सरकारीतंत्र की लापरवाही और भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति ने भारत को विश्व के सामने शर्मसार कर दिया है। सरकार और आयोजकों ने समय रहते कार्य पूरा न कर, अपनी अक्षमता विश्व के समक्ष प्रकट की है और यह साबित कर दिया है कि बड़े अंतराष्ट्रीय आयोजन करना भारत के बूते की बात नहीं है। पड़ोसी देश चीन का उदाहरण लें जिसने ओलम्पिक खेल का आयोजन सफलता पूर्वक कर, जिस तरह अपनी शक्ति और क्षमता का प्रदर्शन किया वह काबिले तारीफ है। अपने देश के प्रति उनकी इज्जत की भावना और प्रतिबद्धता ने ही आयोजन को सफल बनाया था।

राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी हों या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित या खेलमंत्री एमएस गिल, अगर यह अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ निभाते हुए समय रहते काम पूरा कर लेते तो आज विश्व में हमारी इतनी फजीहत नहीं होती। लेकिन ईमानदारी और प्रतिबद्धता की उम्मीद देश के सरकारी तंत्र से तो की नहीं जा सकती है। हां मुंहजोरी में इनका कोई सानी नहीं है। अपनी गलतियों को मानने के बजाए ये एक दूसरे पर दोषारोपण करने से बाज नहीं आ रहे हैं। खेल आयोजक दिल्ली प्रशासन पर दोष मढ़ रहा है तो दिल्ली सरकार काम सही ढंग से नहीं होने का ठीकरा खेलगांव के डेवलपर्स पर फोड़ रही है। किन्तु दिल्ली सरकार यह भूल रही है कि इन डेवलपर्स से काम लेने की जिम्मेदारी उनकी ही है। अगर दिल्ली सरकार अपने काम के प्रति इतनी ही सजग होती तो डेवलपर्स जरूर अपना काम सही ढंग से और समय पर करते, लेकिन यहां तो सभी एक दूसरे के साथ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तो कौन किसको क्या कहे। नवनिर्मित फुट ब्रिज का ढहना राष्ट्रमंडल खेल में होने वाले भ्रष्टाचार का एक छोटा उदाहरण मात्र है। राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर ऐसे सैकड़ों करोड़ों के घपले हुए हैं जिसपर सरकार ने खेल के समापन के बाद कार्रवाई की बात की तो लेकिन यह सिर्फ जनता को झांसा देने के लिए है। क्योंकि इस घपले में सरकार से लेकर आयोजन समिति तक सभी शामिल है तो क्या वे खुद पर कार्रवाई करेंगे? किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी यह जनता को समझ लेना चाहिए। रात गई बात गई वाली कहावत यहां चरितार्थ होने वाली है।

चोरी और सीनाजोरी का एक और उदाहरण ले लें, जब राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के प्रमुख माइक फेनेल ने खेलगांव में फैली गंदगी पर असंतोष जाहिर किया तो आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट का बयान आया कि उनके यहां सफाई का पैमाना अलग है और हमारे यहां अलग। यह कह कर भनोट ने तो पूरे विश्व में यह साबित कर दिया कि भारत के लोग गंदगी में जीने के आदी हैं। भारत में सफाई का क्या पैमाना है यह भनोट जैसे अधिकारी और देश के राजनीतिज्ञ ही तो बताएंगे, जिन्होंने पूरे देश में अपने आचार, विचार और व्यवहार से गंदगी फैला रखी है। देश को कैसे साफ-सुथरा रखा जाए इसके लिए न तो खुद जागरूक हैं और न ही नागरिकों को जागरूक करने की जरूरत समझते हैं। हां सरकारी खजाने पर हाथ साफ कैसे किया जाए इस मामले में ये बड़े जागरूक होते हैं। जितनी सजगता और तन्मयता से इन लोगों ने खेल के नाम पर घपला किया है अगर उतनी ही तन्मयता से खेल की तैयारी में लगे रहते तो आज विश्व के सामने देश की इतनी फजीहत नहीं होती।

Friday, August 13

बेमानी आजादी


हर साल की तरह इस बार भी स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियां चल रही हैं या यूं कहिए की औपचारिकता निभाई जा रही है। क्योंकि देशभक्ति की भावना अब लोगों में वैसी नहीं रही जैसी आजादी के लड़ाकों में थी। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल तक इस देश को गुलामी की जंजीर में जकड़े रखा। गांधी, मालवीय, गोखले, बोस, भगत सिंह और आजाद जैसे क्रातिवीरों के अथक प्रयास और बलिदान के कारण ही हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं। आज 63 साल हो गए हमें स्वतंत्र हुए। क्या सही अर्थ में हम स्वतंत्र हो पाए हैं? क्या हमने अपने महापुरुषों के बलिदान का मान रखा है? उन्होंने आजाद भारत के विकास और स्वरूप की जो कल्पना की थी क्या यह देश उस पर खरा उतर पाया है? राष्ट्र पर न्यौछावर होने की भावना जो उस समय के लोगों में थी क्या वैसी भावना आज के लोगों में है। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिन महापुरुषों ने अपनी जान दे कर देश को आजादी दिलाई थी आज उनका देश ऐसे अनैतिक, मौकापरस्त और स्वार्थी लोगों के चंगुल में फंसा है जो अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक और क्रूर हैं। अंग्रेज तो विदेशी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर हमने उन्हें इस देश से तो खदेड़ दिया लेकिन वे लोग जो कहने को हमारे अपने हैं इस देश के कर्णधार बन इसकी इज्जत और अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने के साथ-साथ दीमक की तरह चाट कर उसे खोखला भी कर रहे हैं। ऐसे भीतरघातियों को कहां खदेड़ा जाए? 63 साल आजादी के बाद भी देश में स्वस्थ सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो पायी है। देश की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों के कार्यों में दिन प्रति दिन गिरावट है। व्यवस्था को चलाने वाले लोगों के चरित्र में ही गिरावट आ गई है तो व्यवस्था स्वत: धाराशाई हो ही जाएगी। आज भी आम लोगों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे आजादी के पहले थी। समाज में जिनके पास पावर और पैसा है, वे ही आजादी का सुख उठा रहे हैं। देश की सत्ता जिस राजनीतिक दल के पास होती है। ये राजनेता सत्ता की आड़ में मनमानी करते हैं, पूर्ण रूप से अराजक हो जाते हैं। तभी तो भारत में घोटालों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है और घोटाला करने वाले नेता आजाद भारत में आजादी का असली मजा ले रहे हैं। उन पर किसी तरह की कोई कानूनी पाबंदी नहीं है क्योंकि वे सत्ताधारी हैं, या कभी न कभी अदल बदल कर सत्ता का सुख भोगते रहे हैं। देश का कानून तो छोटे मोटे गुंडों और चोर उचक्कों के लिए है। जो समाज का अहित तो करते है लेकिन छोटे स्तर पर। किन्तु देश का कानून तथाकथित बड़े लोगों (यहां बड़े लोगों कहने का तात्पर्य विचारवान और संस्कारी लोगों से नहीं है क्योंकि आज बड़े लोग की परिभाषा बदल गई है, जिनके पास पैसा और पावर है आज के बड़े लोग वे ही हैं) के बड़े-बड़े काले कारनामों के बाद भी उनकी कारगुजारियों को अनदेखा कर देती है क्योंकि इन्हीं बड़े लोगों की जेब में कानून रहता है। इन्हीं बड़े लोगों के कारण आज देश रसातल में जा रहा है। देश का समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। देश की जनता भी समय के साथ चलने की बात कर, इन बड़े लोगों का अनुसरण करने लगी है और जिसको जहां मौका मिलता है वहां लाभ और लूट में भागीदार बन जाते हैं, ताकि वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में आ सकें। छोटे से लेकर बड़े स्तर तक हर कोई एक दूसरे को लूटने में लगा है। कुछ एक ईमानदार लोग बचे हैं, उन्हें भी सीख दी जाती है समय के साथ बदलने की। उनकी ईमानदारी उनकी मूर्खता समझी जाती है। कुछ तो समाजिक दबाव में खुद को बदल लेते हैं लेकिन जो साहस कर इस व्यवस्था से लडऩे की हिम्मत रखते हैं उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है नहीं तो चुपचाप कुव्यवस्था को देख कर कुढऩे के अलावा वे और कुछ नहीं कर पाते। वे खुद को आजाद भारत की गुलाम जनता के रूप में पाते हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा भारतवर्ष विश्व के भ्रष्टतम देशों की सूची में शामिल है। हमारे महापुरुषों और क्रांतिकारियों ने क्या ऐसे ही भ्रष्ट देश के लिए बलिदान दिया था? आज उनकी आत्मा देश की दुर्दशा पर आंसू बहा रही होगी। सत्ताभोगियों ने देश को ही नहीं बल्कि महापुरुषों के त्याग और बलिदान को भी शर्मसार किया है, उनके आदर्श भारत की कल्पना को धूलधुसरित कर दिया है।

Tuesday, June 29

जनता त्रस्त, सत्ता मस्त

लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान जनता पर सरकार ने पेट्रोल, रसोई गैस और डीजल के दाम में बढ़ोत्तरी कर फिर से कहर बरपाया है। महंगाई की मार से त्रस्त जनता आशा कर रही थी कि खाद्य पदार्थों के आसमान छूती कीमतों पर सरकार लगाम लगाएगी। किन्तु सरकार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ा कर जनता को राहत देने के बजाए उसकी जेब कतरने में लगी है। पहले से ही महंगाई की मार से झुकी लोगों की कमर को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया है देश के नेताओं ने।
पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढऩे का मतलब है कि सभी खाद्य पदार्थों से लेकर यातायात किराये में बढ़ोत्तरी होगी। ऐसा करके सरकार ने आम जनता के पेट पर सीधे लात मारी है। सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में ज्यादातर मध्य वर्ग, निम्म मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोग हैं। सीमित कमाई होने की वजह उन्हें बहुत सोच समझकर घर का बजट चलाना होता है, ऐसे में रोज़मर्रा के सामान की कीमत में लगातार होती वृद्धि ने उनके बजट-संतुलन को हिला कर रख दिया है। अन्य समानों में कटौती के साथ-साथ अब तो भोजन में भी कटौती करने की नौबत आ गई है। अब लोगों के जीवन का दायरा किसी तरह पेट पालने में ही उलझ कर रह गया है।
ज्यादातर परिवार ऐसे हैं जिनके लिए सौ रुपए किलो दाल खरीदना बिल्कुल ही संभव नहीं है। सब्जी, दूध, चीनी जैसी जरूरत की चीजों में बहुत कटौती करनी पड़ रही है। पहले गरीबों का खाना दाल रोटी हुआ करता था किन्तु अब उन्हें रोटी नमक भी मुश्किल से नसीब हो रहा है। सामान्य आय वर्ग के लोग तो किसी तरह खा ले रहे हैं किन्तु गरीब कुपोषण के शिकार हो भूखों मर रहे हैं। सरकार है कि लोगों को पौष्टिक खाना तो भूल ही जाएं रोटी, दाल, चावल भी उचित कीमत पर उपलब्ध नहीं करा रही है। जिससे आम जनता पेट भर खा सके। सरकार कहती है कि देश तरक्की कर रहा है किन्तु वास्तविकता के धारातल पर देखें तो समझ में आएगा कि यह कैसी तरक्की है, जहां लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं। लोग पानी बिजली के लिए तरस रहे हैं। देश में हजारों टन गेहूं सड़ रहा है और सरकार अनाज की कमी का रोना रोकर खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ाए जा रही है। कभी कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर सरकार जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ाती है तो कभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में वृद्धि के नाम पर अपने नागरिकों पर और बोझ डाल देती है।
जिस देश में कॉमन-मैन को दो जून का भोजन नहीं मिलता हो ऐसे देश में कॉमन वेल्थ गेम का क्या औचित्य है? खेल केआयोजन पर हजारों करोड़ रुपए का खर्च और भूखे पेट के लिए भोजन के आयोजन पर कुछ नहीं? खेल के इस खर्चे का बोझ भी जनता के ही सिर मढ़ दिया जाएगा। कांग्रेस ने अपने पिछले पांच साल के शासन में विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी का रोना रोकर कीमतों मे इजाफा किया था पर आर्थिक संकट का दौर समाप्त हो जाने के बाद भी घरेलू सामान की कीमतों में लगातार होती बढ़ोत्तरी जनता की समझ से परे है।
सुविधा प्रदान करने के नाम पर सरकार जनता से टैक्स तो वसूल कर लेती है किन्तु जनता के पैसे पर सुविधाएं मंत्री, एमपी, एमएलए भोगते हैं। एसी बंगला, एसी गाड़ी, एसी दफ्तर, 24 घंटे बिजली पानी की व्यवस्था, मुफ्त हवाई यात्रा, मुफ्त टेलिफोन सुविधा और न जाने क्या-क्या सुविधाएं इन्होंने देश और जनता की सेवा के नाम पर ले रखी हैं। सिर्फ जनता ही महंगाई की मार और कटौती का दुख क्यों सहे? इन सुविधाभोगी मंत्रियों पर भी कटौती की कैंची चलनी चाहिए। अगर जनता को सुविधा नहीं मिल रही है तो इन मंत्रियों का नैतिक दायित्व बनता है कि वे भी अपनी सुविधा का परित्याग करें। किन्तु आज के नेताओं में नैतिकता बची ही कहां है।
जनता ने कांग्रेस को इस आशा से सत्ता सौंपी थी कि यह सरकार जनता की समस्याओं को समझेगी और उसे दूर करेगी, किन्तु कांग्रेस सरकार उद्योगपतियों और कालाबाजारियों का हित साधने में लगी है। कांग्रेस की सरकार के आने के बाद महंगाई जितनी तेजी से बढ़ी है शायद ही कभी बढ़ी होगी। वर्तमान सरकार अपने हर मोर्चे पर विफल रही है चाहे वह नक्सलवाद का मुद्दा हो, आतंकवाद का या फिर महंगाई का। यह आम जनता की कसौटी पर खड़ी नहीं उतर पा रही है। अगर सरकार जनता की निहायत जरूरी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पा रही तो ऐसी सरकार का नैतिक दायित्व बनता है कि वह त्यागपत्र दे दे।