Wednesday, May 12

हिंदी राष्ट्र की बिंदी

किसी भी देश की राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगान व राष्ट्र ध्वज उस देश के लिए और वहां की जनता के लिए सम्मान और गौरव का प्रतीक होता है। हमारा देश धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। यहां विभिन्न भाषा, धर्म एवं वर्ण के लोग रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा ‘हिंदी’ को राष्ट्रभाषा के रूप में जन स्वीकृति प्राप्त है, किन्तु संवैधानिक रूप से इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त नहीं है। भारत में लगभग 347 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें 22 भाषाओं को संवैधानिक रूप से सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा प्राप्त है, उसमें हिंदी भी एक है। बड़े शर्म की बात है कि भाषा के मामले में समृद्ध इस देश की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। भारत के दस राज्यों में हिंदी को सरकारी काम-काज की भाषा का दर्जा प्राप्त है। भारत की ज्यादातर आबादी हिंदी जानती है, भले ही वे हिंदी भाषी न हों। किन्तु हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना उन्हें स्वीकार नहीं है। इतना ही नहीं भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या अंग्रेजी से ज्यादा है फिर भी हिंदी को माध्यम की भाषा न बनाकर अंग्रेजी को माध्यम की भाषा बनाया गया है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि बहुभाषीय देश में एक विदेशी भाषा ने इतनी मजबूती से जड़ जमा लिया है कि वह माध्यम की भाषा बन बैठी। यह भारत की संस्कृति पर कालिख पुतने के समान है। अंग्रेजों ने भी हमारी आपसी फूट और कलह का लाभ उठाकर जिस तरह सैकड़ों वर्ष तक राज किया था उसी तरह भाषा को लेकर आपसी फूट का ही नतीजा है कि आज हम अंग्रेजी भाषा के भी गुलाम हो गए और इसका मुख्य कारण भाषा को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की सस्ती राजनीति है। महाराष्ट्र में शिवसेना हो या मनसे, विधान सभा में अंग्रेजी में शपथ लेने वालों से कोई गुरेज नहीं, उन्हें हिंदी में शपथ ग्रहण करने वालों से परहेज है। सपा नेता को महाराष्ट्र विभानसभा में हिंदी में शपथ लेने का खमियाजा मनसे नेताओं का तमाचा खाकर भुगतना पड़ा। दरअसल, यह तमाचा सपा नेता पर नहीं बल्कि देश की भाषा और अस्मिता दोनों पर था। बंगाल हो या महाराष्ट्र कोई भी हिंदी अपनाने को तैयार नहीं, हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिए जाने के पुरजोर विरोध की शुरुआत दक्षिणी राज्यों से हुई। भाषा के सवाल पर भारतवर्ष में कलह व्याप्त है और नतीजे में अंग्रेजी भाषा सम्पूर्ण भारतीय समाज के सिर चढ़कर बोलने लगी है। इसका नशा नई पीढ़ी पर और चढ़ता ही जा रहा है। लोगों पर अंग्रेजियत का भूत इतना सवार है कि हिंदी जानते हुए भी वे अंग्रेजी में ही बात करना पसंद करते है। हिंदी में कोई सवाल कर रहा होता है तो उसका जवाब भी वे अंग्रेजी में ही देना पसंद करते हैं। हमारे लिए हर भाषा सम्माननीय है। विभिन्न भाषाओं को सम्मान देना और उसकी जानकारी रखना हमारे लिए ज्ञानवर्धक है। यह भी सच है कि हमारे देश के अधिकांश लोगों को दो से तीन भाषाओं की जानकारी भी है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम हिंदी की उपेक्षा कर अंग्रेजी को महत्व दें। हमें अपनी सभ्यता संस्कृति को संभालकर रखना है तो हमें अपनी भाषा को भी संभाल कर रखना होगा। उसे हमें विदेशी भाषाओं से श्रेष्ठ मानना और स्थापित करना होगा। हमें हिंदी पर गर्व करना चाहिए तभी देश गौरवान्वित होगा। हिंदी की उपेक्षा राष्ट्र की उपेक्षा है। हमें चीन से, रूस से, जापान से या इन जैसे तमाम उन देशों से सीख लेनी चाहिए जहां राष्ट्रभाषा का सम्मान राष्ट्रध्वज से कम नहीं। जहां के नेता या नागरिक कहीं भी जाएं अपनी राष्ट्रभाषा में ही बातें करेंगे। आपको समझने की जरूरत हो तो द्विभाषिये की मदद लें। क्या आप यह समझते हैं कि चीनी, जापानी या रूसी अंग्रेजी भाषा नहीं जानते? अगर आप ऐसा समझते हैं तो आपकी यह भयंकर भूल है, वैसी ही भूल जैसी आप अंग्रेजीदां बन कर कर रहे हैं...

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