Monday, May 31
फिर सरकार का मतलब क्या है?
ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसा माओवादी हमला है या किसी राजनीतिक साजिश के तहत इसे अंजाम दिया गया है इस पर नेताओं के बीच वाक युद्घ जारी है। आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला जा रहा है। एक तरफ रेल मंत्री ममता बनर्जी इसे राजनीतिक साजिश का नाम दे सांकेतिक रूप से इसके लिए वामदलों को दोषी मान रही हैं तो दूसरी तरफ वामदलों का कहना है कि इस हादसे के लिए ममता समर्थित माओवादी संगठन पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज (पीसीपीए) जिम्मेदार है। ममता बनर्जी ने अपना पूरा ध्यान कोलकाता में होने वाले नगर निगम चुनाव में लगा रखा है। इसलिए इस हादसे की सीबीआई जांच की मांग कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे की कोशिश में लगी हैं। जबकि इस रेल हादसे की नैतिक और वैधानिक रूप से जिम्मेदार रेल मंत्री ही हैं। राजनीतिक स्वार्थपरता की हद तो देखें, हादसे में मारे गए लोगों की पीड़ा व परेशानी महसूस करने, और ऐसा हादसा फिर न हो इसके लिए ठोस कदम उठाने के बजाय पूरी सरकार और विपक्ष राजनीति करने में लग गई है। इन नेताओं और मंत्रियों का आम आदमी से कोई लेना देना नहीं है। नेताओं को इनकी याद सिर्फ चुनाव के वक्त ही आती है। चुनाव जीतने के बाद ये जनता के सेवक नहीं बल्कि खुद को शासक समझने लगते हैं और सत्ता सुख का आनंद लेने में लग जाते हैं। आम आदमी का क्या, कीड़े मकोड़ों की तरह है जब जो चाहे मसल दे। मुद्दा यह नहीं है कि जो हादसे हो रहे हैं वह माओवादी हमला है या आतंकी या कोई राजनीतिक साजिश, मुद्दा यह है कि सरकार इस तरह के हमलों को रोकने में सक्षम क्यों नहीं है? पूरी तरह नाकाम क्यों है? सबसे बड़े जनतंत्र की सरकार चंद माओवादियों और आतंकवादियों के सामने घुटने टेक चुकी है। लगातार हो रहे हमलों में हजारों की जानें जा चुकी हैं। सैकड़ों बच्चे अनाथ हो गए और औरतें विधवा। किसी का पूरा का पूरा परिवार ही समाप्त हो गया फिर भी सरकार की आंखें नहीं खुल रही हैं! चंद रुपए मुआवजे में देकर और हादसे पर अफसोस जाहिर कर सरकार आंखें मूंद लेती है फिर न तो वह मारे गए लोगों की दुर्दशा देखती है और न ही मरने वालों के परिवार के उस दुख को जो वे आजीवन भोगते हैं। सरकार को लोगों की जान से ज्यादा चिंता अपने वोट बैंक की रहती है। जब भी कोई हमला होता है तो सरकार उससे निबटने के लिए रणनीति बनाने में लग जाती है तब तक दूसरा हमला हो जाता है। इस नाकारा सरकार से ज्यादा संगठित और अनुशासित तो माओवादी और आतंकी हैं जो अपने कारनामे सफलतापूर्वक कर दिखाते हैं। चंद माओवादियों ने सरकार की नाक में दम कर रखा है। सरकार और सुरक्षाकर्मी नक्सली हमले को रोकने में पूरी तरह नाकाम हैं। सरकार द्वारा सुरक्षाकर्मियों को बुनियादी जरूरत की चीजें भी मुहैया नहीं की जाती। उन्हें नक्सलियों से निबटने में अनेक तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और अपनी फिजूल में जान गंवानी पड़ रही है। त्वरित परिणाम के लिए सरकार सेना की मदद ले सकती है किन्तु सरकार इस पर फैसला लेने में भी हिचक रही है क्योंकि इससे गृह मंत्रालय की विफलता सामने आ जाएगी। इस मामले से निबटने के लिए सरकार में भी आपसी मतभेद है। सत्ता स्वार्थ में लिप्त ये राजनेता माओवादियों के खिलाफ कोई भी ठोस कदम उठाने से हिचकते हैं क्योंकि अपने किसी न किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए इन नेताओं ने ही उन्हें प्रश्रय दे रखा है। सरकार की तरह हम जनता भी कम दोषी नहीं हैं। हम भी देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भुला कर स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। सरकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन अगर ईमानदारी से नहीं कर रही तो उसे जगाने का काम जनता का होना चाहिए। लोगों में एकता नहीं होने के कारण ही आज सरकार मनमानी कर रही है और हम चुपचाप नेताओं को आबाद होते हुए और खुद को बर्बाद होते हुए देख रहे हैं।
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