Saturday, May 22

नाम बड़े पर करम हैं ओछे

आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी का जमाना अब नहीं रहा। इन शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ भाषणबाजी तक ही सीमित रह गया है। जो महानुभाव नैतिकता और ईमानदारी की बातें करते हैं, वह बखूबी जानते हैं कि इन बातों से उनका दूर-दूर तक सरोकार नहीं है। मीडिया को ही लें, अब यह प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए नहीं बल्कि यह दलाली, ब्लैकमेलिंग और व्यभिचार का जरिया बन कर रह गयी है। पैसा लेकर किसी के पक्ष में तो किसी के खिलाफ खबरें बनती हैं। मीडिया किसी के पीछे पड़ जाए तो उसका दामन तार-तार करके ही छोड़ती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण शशि थरूर हैं। थरूर प्रकरण को मीडियावालों ने इतना उछाला कि उन्हें मंत्री पद से हाथ होना पड़ा, पर दलाली में लिप्त एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त व हिन्दुस्तान टाइम्स के सलाहकार संपादक और स्तंभकार वीर संघवी मामले में मीडिया की चिल्लपों सुनाई नहीं दे रही है। सबसे तेज चैनेल ‘आज-तक’ की तेजी कहां चली गई। ‘एनडीटीवी’ अपने ग्रुप एडिटर की कारगुजारियों की पोल पूरी सच्चाई से जनता के समक्ष क्यों नहीं खोल रहा है? वीर संघवी और बरखा दत्त जैसे बड़े पत्रकारों की ओछी हरकत पर मीडिया मौन साधे क्यों है? उनकी काली करतूत उजागर होने पर उन्हें पद से क्यों नहीं हटाया जा रहा है? शशि थरूर मामले में मीडिया जितनी जागरूक और सक्रिय थी, इस मामले में क्यों नहीं है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका जबाव मीडिया को जनता के समक्ष रखना होगा नहीं तो जो भी थोड़ा बहुत मीडिया पर जनता का विश्वास है वह भी उठ जाएगा। बरखा दत्त व वीर संघवी, देश के दो बड़े नामचीन पत्रकार। पैसा, रुतबा सभी तो है उनके पास। फिर उन्हें दलाली में मुंह काला करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? शायद असीमित महत्वाकांक्षा ही उन्हें ऐसे अमर्यादित कृत्य करने के लिए प्रेरित करती हो! ऊंचे ओहदे और मोटी सैलरी पर तैनात इन पत्रकारों ने अपनी साख और रुतबे का भी मान नहीं रखा। बरखा दत्त ने तो अपने पद्म सम्मान को भी कलंकित किया है। सरकार द्वारा पद्मश्री दिए जाने पर हमेशा से सवाल खड़ा होता रहा है। किन्तु बरखा दत्त व चटवाल जैसे दलालों व चाटुकारों को यह सम्मान दिया जाना इस सवाल के औचित्य पर मुहर लगाता है। नीरा राडिया के साथ-साथ बरखा दत्त और वीर संघवी भी अब देश के बड़े दलालों में शुमार हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि नीरा राडिया, बरखा दत्त और वीर संघवी ने मिलकर टाटा और अंबानी को संचार मंत्रालय से फायदा पहुंचाने के लिए दलाली की। पत्रकारिता की आड़ में दलाली कर रहे इन दोनों पत्रकारों के खिलाफ सीबीआई और आयकर विभाग के पास पुख्ता सबूत हैं। दलाली को लेकर इन लोगों के बीच फोन पर हुई बातचीत के टेप भी खुफिया एजेंसियों के पास उपलब्ध हैं। लेकिन इस मामले में दोनों पत्रकारों ने चुप्पी साध रखी है, और इसमें उनका साथ दे रही है मीडिया। शायद वे अपने रसूख और पहुंच की वजह से बेदाग साबित हो जाएं। सीबीआई और आयकर विभाग के सबूत का क्या? ये संस्थाएं तो प्रभाव के दबाव में काम करती हैं। सबूत को तोड़-मरोड़ कर आसानी से रफा-दफा करवाया जा सकता है। इस दलाली प्रकरण से सत्ता, उद्योग जगत, पत्रकारिता और नौकरशाहों के बीच के गंदे गठजोड़ का घिनौना रूप सामने आया है। कभी ये पत्रकार सत्ता के लिए दलाली करते हैं तो कभी उद्योग जगत के लिए, तो कभी मंत्री और नौकरशाहों के बीच का दलाल बन कर ट्रांसफर पोस्टिंग में माल कमाते हैं। अब अखबारों के मालिक भी प्रतिबद्ध पत्रकारों के बजाए दलालों को ही नियुक्त करना पसंद करते हैं ताकि उनका धंधा फलता-फूलता रहे। वैसे भी अब ईमानदार, सच्चरित्र और नैतिक लोगों के लिए इस गलीज पत्रकारिता में कोई जगह नहीं रह गई है। पत्रकारिता जगत के इन मठाधीशों के कारमानों के बाद क्या मीडिया से पारदर्शिता की उम्मीद की जा सकती है? शायद नहीं।

3 comments:

  1. आपने बिलकुल सही कहा है, देश के सबसे भ्रष्ट बिरादरी में से एक पत्रकारों की बिरादरी है. अपने आप को किसी तोप से कम नहीं समझते हैं. भ्रस्टाचार को बढ़ावा देने में इनका ही हाँथ है.

    ReplyDelete
  2. वैष्णवी वंदना का लेख मीडिया जगत से जुड़े लोगों के लिए आँखें खोलने वाला है, लेकिन आँखें भी उन्हीं की खुलती हैं जिनकी आँखें होती हैं. अगर बरखा दत्त और वीर संघवी जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के पास नैतिकता की आँखें होतीं तो वे गलीज़ हरकतों में मुब्तिला ही क्यों होते? पूरी भारतीय पत्रकारिता की पोल खुल गई जब ऐसे दलाल पत्रकारों की करतूतों पर मीडिया ने पर्दा डाल दिया और अपने दायित्वों के प्रति आपराधिक उपेक्षा बरती. वाकई इस लेख से गुजरते हुए मीडिया को धिक्कारने के भाव से अलग नहीं रह पाया. लेख के लिए हार्दिक बधाई और ऐसी भारतीय मीडिया को हज़ार हज़ार धिक्कार.
    वरुण शर्मा, हैदराबाद

    ReplyDelete
  3. sahsa vishwas nai hota. Jo is peshe ke rol model hai, unka ye hal, lekin puri ghatna to bataye, mujhe kuchh pata nahi.waise ab adhikansh paper malik patrakar ki jagah dalal rakhana chahte hai. Jo unke liye Satta ke darbar me dlali ka sake, Usi daur me kuchh patrakar apne liye bhi dalali karne lag jate hai. Jo aisa nahi karte, kinara kar diya jata hai.

    ReplyDelete