भ्रष्ट होता समाज
समाज आधुनिक से अत्याधुनिक होता जा रहा है, इधर के कुछ वर्षों में समाज में क्रांतिकारी परिर्वतन आए है। देश-दुनिया तकनीकी रूप से विकास की ऊंचाइयों को छूता गया किन्तु हम चारित्रिक रूप से पतन के गर्त में समाते चले गए। समाज में आदर्शों और चरित्रों के स्थान पर पैसे का बोल-बाला होता गया। समाज की विचारधाराएं बदलती गई और व्यक्ति के आचार-विचार व व्यवहार में आमूल परिवर्तन आ गया। आदर्श, ईमानदारी, नैतिकता की बातें अब किताबों तक ही सीमित रह गई है। इन सब बातों को आज व्यक्ति अपने जीवन में समाहित नहीं करता। यह सारी बातें आउट डेटेड हो गई हैं। आज लोग पैसों के लिए बुराइयों क सामना बड़ी सच्चाई और निडरता के साथ करने लगे हैं। अपने चारित्रिक दोषों को समाज के सामने जिस सच्चाई के साथ स्वीकार करते हैं उससे उन्हें शर्म नहीं आती बल्कि वे गौरवान्वित महसूस करते हैं। घूसखोरी, दलाली, जमाखोरी जैसी बुराइयां समाज द्वारा मान्यता प्राप्त सच्चाई है और इसे अच्छाई की श्रेणी में रखा गया है, आज का सच यही है। आधुनिकता का जामा ओढ़े आज का समाज अपनी सभ्यता-संस्कृति भूलता जा रहा है। हमारी संस्कृति हमें शालीनता, सलज्ज और सुसंस्कृत होने की शिक्षा देती है। जब तक समाज इस धरोहर को समेटे रखा, हमारे समाज में बुराइयां नाम मात्र थीं। किन्तु जब से हम अपनी संस्कृति को भूल पाश्चात्य जीवन शैली का दामन थाम इतराने लगे, समाज में बुराइयां जड़ जमाने लग गईं। हत्या, बलात्कार, लूटपाट की घटनाएं आम हो गईं। कोई वेलेंटाईन डे पर अपनी गर्ल फ्रेन्ड को गिफ्ट देने के लिए लूटपाट करता है, तो कोई प्रेयसी को पाने के लिए हत्या जैसे कर्म करने से भी नहीं हिचकता। रास्ते पर चलती लड़कियों से बलात्कार तो आम बात हो गई है, यह कैसा आधुनिक समाज है? जहां व्यक्ति, व्यक्ति से सुरक्षित नहीं, चारों तरफ अविश्वास फैला हो, जहां वचनों का कोई मोल नहीं, संपत्ति के लिए भाई-भाई का दुश्मन हो रहा हो, बेटी बाप जैसे पवित्र संबंध सुरक्षित नहीं। लड़कियां अपनी आधुनिक जीवन शैली को बरकरार रखने के लिए वेश्यावृत्ति तक करने से नहीं हिचकती। तथाकथित आधुनिक समाज पाप के पंक में धंसता जा रहा है फिर भी उसे एक ऐसे मजबूत डोर की जरूरत महसूस नहीं हो रही जिसे पकड़कर इस दलदल से बाहर आ सके। समाज पर पाप का बोझ बढ़ता जा रहा है, घड़ा छलकने को है, विनाश तो प्रत्यक्ष है ही।
Sunday, May 2
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