Friday, October 1

कॉमन-वेल्थ 'लूट' गेम

सुबह-सुबह अखबार देखा तो पहले ही पेज पर खेल गांव में फैली कुव्यवस्था और गंदगी की पोल खोलती रिपोर्ट और तस्वीरें सामने थीं। इधर अखबारों में लगातार राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में होने वाले विलंब और भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं। इसमें नवनिर्मित फुट-ब्रिज का ढहना हो, खेलगांव में खिलाडिय़ों के लिए बनाए गए फ्लैट से सांप निकलने की घटना हो, फ्लैट में फैली गंदगी का मामला हो या आधी अधूरी तैयारी का। सरकार और आयोजन समिति की लचर नीति और आपसी समन्वय में कमी का ही नतीजा है कि चार साल का समय और हजारों करोड़ रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी तैयारी पूरी नहीं हो पायी। भारत जैसे विकासशील देश को राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन का अधिकार मिलना गौरव की बात है। ऐसे में भारत को विश्व के सामने अपनी क्षमता दिखाने का सुअवसर मिला था लेकिन सरकारीतंत्र की लापरवाही और भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति ने भारत को विश्व के सामने शर्मसार कर दिया है। सरकार और आयोजकों ने समय रहते कार्य पूरा न कर, अपनी अक्षमता विश्व के समक्ष प्रकट की है और यह साबित कर दिया है कि बड़े अंतराष्ट्रीय आयोजन करना भारत के बूते की बात नहीं है। पड़ोसी देश चीन का उदाहरण लें जिसने ओलम्पिक खेल का आयोजन सफलता पूर्वक कर, जिस तरह अपनी शक्ति और क्षमता का प्रदर्शन किया वह काबिले तारीफ है। अपने देश के प्रति उनकी इज्जत की भावना और प्रतिबद्धता ने ही आयोजन को सफल बनाया था।

राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी हों या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित या खेलमंत्री एमएस गिल, अगर यह अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ निभाते हुए समय रहते काम पूरा कर लेते तो आज विश्व में हमारी इतनी फजीहत नहीं होती। लेकिन ईमानदारी और प्रतिबद्धता की उम्मीद देश के सरकारी तंत्र से तो की नहीं जा सकती है। हां मुंहजोरी में इनका कोई सानी नहीं है। अपनी गलतियों को मानने के बजाए ये एक दूसरे पर दोषारोपण करने से बाज नहीं आ रहे हैं। खेल आयोजक दिल्ली प्रशासन पर दोष मढ़ रहा है तो दिल्ली सरकार काम सही ढंग से नहीं होने का ठीकरा खेलगांव के डेवलपर्स पर फोड़ रही है। किन्तु दिल्ली सरकार यह भूल रही है कि इन डेवलपर्स से काम लेने की जिम्मेदारी उनकी ही है। अगर दिल्ली सरकार अपने काम के प्रति इतनी ही सजग होती तो डेवलपर्स जरूर अपना काम सही ढंग से और समय पर करते, लेकिन यहां तो सभी एक दूसरे के साथ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तो कौन किसको क्या कहे। नवनिर्मित फुट ब्रिज का ढहना राष्ट्रमंडल खेल में होने वाले भ्रष्टाचार का एक छोटा उदाहरण मात्र है। राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर ऐसे सैकड़ों करोड़ों के घपले हुए हैं जिसपर सरकार ने खेल के समापन के बाद कार्रवाई की बात की तो लेकिन यह सिर्फ जनता को झांसा देने के लिए है। क्योंकि इस घपले में सरकार से लेकर आयोजन समिति तक सभी शामिल है तो क्या वे खुद पर कार्रवाई करेंगे? किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी यह जनता को समझ लेना चाहिए। रात गई बात गई वाली कहावत यहां चरितार्थ होने वाली है।

चोरी और सीनाजोरी का एक और उदाहरण ले लें, जब राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के प्रमुख माइक फेनेल ने खेलगांव में फैली गंदगी पर असंतोष जाहिर किया तो आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट का बयान आया कि उनके यहां सफाई का पैमाना अलग है और हमारे यहां अलग। यह कह कर भनोट ने तो पूरे विश्व में यह साबित कर दिया कि भारत के लोग गंदगी में जीने के आदी हैं। भारत में सफाई का क्या पैमाना है यह भनोट जैसे अधिकारी और देश के राजनीतिज्ञ ही तो बताएंगे, जिन्होंने पूरे देश में अपने आचार, विचार और व्यवहार से गंदगी फैला रखी है। देश को कैसे साफ-सुथरा रखा जाए इसके लिए न तो खुद जागरूक हैं और न ही नागरिकों को जागरूक करने की जरूरत समझते हैं। हां सरकारी खजाने पर हाथ साफ कैसे किया जाए इस मामले में ये बड़े जागरूक होते हैं। जितनी सजगता और तन्मयता से इन लोगों ने खेल के नाम पर घपला किया है अगर उतनी ही तन्मयता से खेल की तैयारी में लगे रहते तो आज विश्व के सामने देश की इतनी फजीहत नहीं होती।

Friday, August 13

बेमानी आजादी


हर साल की तरह इस बार भी स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियां चल रही हैं या यूं कहिए की औपचारिकता निभाई जा रही है। क्योंकि देशभक्ति की भावना अब लोगों में वैसी नहीं रही जैसी आजादी के लड़ाकों में थी। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल तक इस देश को गुलामी की जंजीर में जकड़े रखा। गांधी, मालवीय, गोखले, बोस, भगत सिंह और आजाद जैसे क्रातिवीरों के अथक प्रयास और बलिदान के कारण ही हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं। आज 63 साल हो गए हमें स्वतंत्र हुए। क्या सही अर्थ में हम स्वतंत्र हो पाए हैं? क्या हमने अपने महापुरुषों के बलिदान का मान रखा है? उन्होंने आजाद भारत के विकास और स्वरूप की जो कल्पना की थी क्या यह देश उस पर खरा उतर पाया है? राष्ट्र पर न्यौछावर होने की भावना जो उस समय के लोगों में थी क्या वैसी भावना आज के लोगों में है। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिन महापुरुषों ने अपनी जान दे कर देश को आजादी दिलाई थी आज उनका देश ऐसे अनैतिक, मौकापरस्त और स्वार्थी लोगों के चंगुल में फंसा है जो अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक और क्रूर हैं। अंग्रेज तो विदेशी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर हमने उन्हें इस देश से तो खदेड़ दिया लेकिन वे लोग जो कहने को हमारे अपने हैं इस देश के कर्णधार बन इसकी इज्जत और अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने के साथ-साथ दीमक की तरह चाट कर उसे खोखला भी कर रहे हैं। ऐसे भीतरघातियों को कहां खदेड़ा जाए? 63 साल आजादी के बाद भी देश में स्वस्थ सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो पायी है। देश की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों के कार्यों में दिन प्रति दिन गिरावट है। व्यवस्था को चलाने वाले लोगों के चरित्र में ही गिरावट आ गई है तो व्यवस्था स्वत: धाराशाई हो ही जाएगी। आज भी आम लोगों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे आजादी के पहले थी। समाज में जिनके पास पावर और पैसा है, वे ही आजादी का सुख उठा रहे हैं। देश की सत्ता जिस राजनीतिक दल के पास होती है। ये राजनेता सत्ता की आड़ में मनमानी करते हैं, पूर्ण रूप से अराजक हो जाते हैं। तभी तो भारत में घोटालों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है और घोटाला करने वाले नेता आजाद भारत में आजादी का असली मजा ले रहे हैं। उन पर किसी तरह की कोई कानूनी पाबंदी नहीं है क्योंकि वे सत्ताधारी हैं, या कभी न कभी अदल बदल कर सत्ता का सुख भोगते रहे हैं। देश का कानून तो छोटे मोटे गुंडों और चोर उचक्कों के लिए है। जो समाज का अहित तो करते है लेकिन छोटे स्तर पर। किन्तु देश का कानून तथाकथित बड़े लोगों (यहां बड़े लोगों कहने का तात्पर्य विचारवान और संस्कारी लोगों से नहीं है क्योंकि आज बड़े लोग की परिभाषा बदल गई है, जिनके पास पैसा और पावर है आज के बड़े लोग वे ही हैं) के बड़े-बड़े काले कारनामों के बाद भी उनकी कारगुजारियों को अनदेखा कर देती है क्योंकि इन्हीं बड़े लोगों की जेब में कानून रहता है। इन्हीं बड़े लोगों के कारण आज देश रसातल में जा रहा है। देश का समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। देश की जनता भी समय के साथ चलने की बात कर, इन बड़े लोगों का अनुसरण करने लगी है और जिसको जहां मौका मिलता है वहां लाभ और लूट में भागीदार बन जाते हैं, ताकि वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में आ सकें। छोटे से लेकर बड़े स्तर तक हर कोई एक दूसरे को लूटने में लगा है। कुछ एक ईमानदार लोग बचे हैं, उन्हें भी सीख दी जाती है समय के साथ बदलने की। उनकी ईमानदारी उनकी मूर्खता समझी जाती है। कुछ तो समाजिक दबाव में खुद को बदल लेते हैं लेकिन जो साहस कर इस व्यवस्था से लडऩे की हिम्मत रखते हैं उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है नहीं तो चुपचाप कुव्यवस्था को देख कर कुढऩे के अलावा वे और कुछ नहीं कर पाते। वे खुद को आजाद भारत की गुलाम जनता के रूप में पाते हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा भारतवर्ष विश्व के भ्रष्टतम देशों की सूची में शामिल है। हमारे महापुरुषों और क्रांतिकारियों ने क्या ऐसे ही भ्रष्ट देश के लिए बलिदान दिया था? आज उनकी आत्मा देश की दुर्दशा पर आंसू बहा रही होगी। सत्ताभोगियों ने देश को ही नहीं बल्कि महापुरुषों के त्याग और बलिदान को भी शर्मसार किया है, उनके आदर्श भारत की कल्पना को धूलधुसरित कर दिया है।

Tuesday, June 29

जनता त्रस्त, सत्ता मस्त

लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान जनता पर सरकार ने पेट्रोल, रसोई गैस और डीजल के दाम में बढ़ोत्तरी कर फिर से कहर बरपाया है। महंगाई की मार से त्रस्त जनता आशा कर रही थी कि खाद्य पदार्थों के आसमान छूती कीमतों पर सरकार लगाम लगाएगी। किन्तु सरकार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ा कर जनता को राहत देने के बजाए उसकी जेब कतरने में लगी है। पहले से ही महंगाई की मार से झुकी लोगों की कमर को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया है देश के नेताओं ने।
पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढऩे का मतलब है कि सभी खाद्य पदार्थों से लेकर यातायात किराये में बढ़ोत्तरी होगी। ऐसा करके सरकार ने आम जनता के पेट पर सीधे लात मारी है। सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में ज्यादातर मध्य वर्ग, निम्म मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोग हैं। सीमित कमाई होने की वजह उन्हें बहुत सोच समझकर घर का बजट चलाना होता है, ऐसे में रोज़मर्रा के सामान की कीमत में लगातार होती वृद्धि ने उनके बजट-संतुलन को हिला कर रख दिया है। अन्य समानों में कटौती के साथ-साथ अब तो भोजन में भी कटौती करने की नौबत आ गई है। अब लोगों के जीवन का दायरा किसी तरह पेट पालने में ही उलझ कर रह गया है।
ज्यादातर परिवार ऐसे हैं जिनके लिए सौ रुपए किलो दाल खरीदना बिल्कुल ही संभव नहीं है। सब्जी, दूध, चीनी जैसी जरूरत की चीजों में बहुत कटौती करनी पड़ रही है। पहले गरीबों का खाना दाल रोटी हुआ करता था किन्तु अब उन्हें रोटी नमक भी मुश्किल से नसीब हो रहा है। सामान्य आय वर्ग के लोग तो किसी तरह खा ले रहे हैं किन्तु गरीब कुपोषण के शिकार हो भूखों मर रहे हैं। सरकार है कि लोगों को पौष्टिक खाना तो भूल ही जाएं रोटी, दाल, चावल भी उचित कीमत पर उपलब्ध नहीं करा रही है। जिससे आम जनता पेट भर खा सके। सरकार कहती है कि देश तरक्की कर रहा है किन्तु वास्तविकता के धारातल पर देखें तो समझ में आएगा कि यह कैसी तरक्की है, जहां लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं। लोग पानी बिजली के लिए तरस रहे हैं। देश में हजारों टन गेहूं सड़ रहा है और सरकार अनाज की कमी का रोना रोकर खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ाए जा रही है। कभी कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर सरकार जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ाती है तो कभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में वृद्धि के नाम पर अपने नागरिकों पर और बोझ डाल देती है।
जिस देश में कॉमन-मैन को दो जून का भोजन नहीं मिलता हो ऐसे देश में कॉमन वेल्थ गेम का क्या औचित्य है? खेल केआयोजन पर हजारों करोड़ रुपए का खर्च और भूखे पेट के लिए भोजन के आयोजन पर कुछ नहीं? खेल के इस खर्चे का बोझ भी जनता के ही सिर मढ़ दिया जाएगा। कांग्रेस ने अपने पिछले पांच साल के शासन में विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी का रोना रोकर कीमतों मे इजाफा किया था पर आर्थिक संकट का दौर समाप्त हो जाने के बाद भी घरेलू सामान की कीमतों में लगातार होती बढ़ोत्तरी जनता की समझ से परे है।
सुविधा प्रदान करने के नाम पर सरकार जनता से टैक्स तो वसूल कर लेती है किन्तु जनता के पैसे पर सुविधाएं मंत्री, एमपी, एमएलए भोगते हैं। एसी बंगला, एसी गाड़ी, एसी दफ्तर, 24 घंटे बिजली पानी की व्यवस्था, मुफ्त हवाई यात्रा, मुफ्त टेलिफोन सुविधा और न जाने क्या-क्या सुविधाएं इन्होंने देश और जनता की सेवा के नाम पर ले रखी हैं। सिर्फ जनता ही महंगाई की मार और कटौती का दुख क्यों सहे? इन सुविधाभोगी मंत्रियों पर भी कटौती की कैंची चलनी चाहिए। अगर जनता को सुविधा नहीं मिल रही है तो इन मंत्रियों का नैतिक दायित्व बनता है कि वे भी अपनी सुविधा का परित्याग करें। किन्तु आज के नेताओं में नैतिकता बची ही कहां है।
जनता ने कांग्रेस को इस आशा से सत्ता सौंपी थी कि यह सरकार जनता की समस्याओं को समझेगी और उसे दूर करेगी, किन्तु कांग्रेस सरकार उद्योगपतियों और कालाबाजारियों का हित साधने में लगी है। कांग्रेस की सरकार के आने के बाद महंगाई जितनी तेजी से बढ़ी है शायद ही कभी बढ़ी होगी। वर्तमान सरकार अपने हर मोर्चे पर विफल रही है चाहे वह नक्सलवाद का मुद्दा हो, आतंकवाद का या फिर महंगाई का। यह आम जनता की कसौटी पर खड़ी नहीं उतर पा रही है। अगर सरकार जनता की निहायत जरूरी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पा रही तो ऐसी सरकार का नैतिक दायित्व बनता है कि वह त्यागपत्र दे दे।

Monday, May 31

फिर सरकार का मतलब क्या है?

ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसा माओवादी हमला है या किसी राजनीतिक साजिश के तहत इसे अंजाम दिया गया है इस पर नेताओं के बीच वाक युद्घ जारी है। आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला जा रहा है। एक तरफ रेल मंत्री ममता बनर्जी इसे राजनीतिक साजिश का नाम दे सांकेतिक रूप से इसके लिए वामदलों को दोषी मान रही हैं तो दूसरी तरफ वामदलों का कहना है कि इस हादसे के लिए ममता समर्थित माओवादी संगठन पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज (पीसीपीए) जिम्मेदार है। ममता बनर्जी ने अपना पूरा ध्यान कोलकाता में होने वाले नगर निगम चुनाव में लगा रखा है। इसलिए इस हादसे की सीबीआई जांच की मांग कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे की कोशिश में लगी हैं। जबकि इस रेल हादसे की नैतिक और वैधानिक रूप से जिम्मेदार रेल मंत्री ही हैं। राजनीतिक स्वार्थपरता की हद तो देखें, हादसे में मारे गए लोगों की पीड़ा व परेशानी महसूस करने, और ऐसा हादसा फिर न हो इसके लिए ठोस कदम उठाने के बजाय पूरी सरकार और विपक्ष राजनीति करने में लग गई है। इन नेताओं और मंत्रियों का आम आदमी से कोई लेना देना नहीं है। नेताओं को इनकी याद सिर्फ चुनाव के वक्त ही आती है। चुनाव जीतने के बाद ये जनता के सेवक नहीं बल्कि खुद को शासक समझने लगते हैं और सत्ता सुख का आनंद लेने में लग जाते हैं। आम आदमी का क्या, कीड़े मकोड़ों की तरह है जब जो चाहे मसल दे। मुद्दा यह नहीं है कि जो हादसे हो रहे हैं वह माओवादी हमला है या आतंकी या कोई राजनीतिक साजिश, मुद्दा यह है कि सरकार इस तरह के हमलों को रोकने में सक्षम क्यों नहीं है? पूरी तरह नाकाम क्यों है? सबसे बड़े जनतंत्र की सरकार चंद माओवादियों और आतंकवादियों के सामने घुटने टेक चुकी है। लगातार हो रहे हमलों में हजारों की जानें जा चुकी हैं। सैकड़ों बच्चे अनाथ हो गए और औरतें विधवा। किसी का पूरा का पूरा परिवार ही समाप्त हो गया फिर भी सरकार की आंखें नहीं खुल रही हैं! चंद रुपए मुआवजे में देकर और हादसे पर अफसोस जाहिर कर सरकार आंखें मूंद लेती है फिर न तो वह मारे गए लोगों की दुर्दशा देखती है और न ही मरने वालों के परिवार के उस दुख को जो वे आजीवन भोगते हैं। सरकार को लोगों की जान से ज्यादा चिंता अपने वोट बैंक की रहती है। जब भी कोई हमला होता है तो सरकार उससे निबटने के लिए रणनीति बनाने में लग जाती है तब तक दूसरा हमला हो जाता है। इस नाकारा सरकार से ज्यादा संगठित और अनुशासित तो माओवादी और आतंकी हैं जो अपने कारनामे सफलतापूर्वक कर दिखाते हैं। चंद माओवादियों ने सरकार की नाक में दम कर रखा है। सरकार और सुरक्षाकर्मी नक्सली हमले को रोकने में पूरी तरह नाकाम हैं। सरकार द्वारा सुरक्षाकर्मियों को बुनियादी जरूरत की चीजें भी मुहैया नहीं की जाती। उन्हें नक्सलियों से निबटने में अनेक तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और अपनी फिजूल में जान गंवानी पड़ रही है। त्वरित परिणाम के लिए सरकार सेना की मदद ले सकती है किन्तु सरकार इस पर फैसला लेने में भी हिचक रही है क्योंकि इससे गृह मंत्रालय की विफलता सामने आ जाएगी। इस मामले से निबटने के लिए सरकार में भी आपसी मतभेद है। सत्ता स्वार्थ में लिप्त ये राजनेता माओवादियों के खिलाफ कोई भी ठोस कदम उठाने से हिचकते हैं क्योंकि अपने किसी न किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए इन नेताओं ने ही उन्हें प्रश्रय दे रखा है। सरकार की तरह हम जनता भी कम दोषी नहीं हैं। हम भी देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भुला कर स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। सरकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन अगर ईमानदारी से नहीं कर रही तो उसे जगाने का काम जनता का होना चाहिए। लोगों में एकता नहीं होने के कारण ही आज सरकार मनमानी कर रही है और हम चुपचाप नेताओं को आबाद होते हुए और खुद को बर्बाद होते हुए देख रहे हैं।

Saturday, May 22

नाम बड़े पर करम हैं ओछे

आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी का जमाना अब नहीं रहा। इन शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ भाषणबाजी तक ही सीमित रह गया है। जो महानुभाव नैतिकता और ईमानदारी की बातें करते हैं, वह बखूबी जानते हैं कि इन बातों से उनका दूर-दूर तक सरोकार नहीं है। मीडिया को ही लें, अब यह प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए नहीं बल्कि यह दलाली, ब्लैकमेलिंग और व्यभिचार का जरिया बन कर रह गयी है। पैसा लेकर किसी के पक्ष में तो किसी के खिलाफ खबरें बनती हैं। मीडिया किसी के पीछे पड़ जाए तो उसका दामन तार-तार करके ही छोड़ती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण शशि थरूर हैं। थरूर प्रकरण को मीडियावालों ने इतना उछाला कि उन्हें मंत्री पद से हाथ होना पड़ा, पर दलाली में लिप्त एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त व हिन्दुस्तान टाइम्स के सलाहकार संपादक और स्तंभकार वीर संघवी मामले में मीडिया की चिल्लपों सुनाई नहीं दे रही है। सबसे तेज चैनेल ‘आज-तक’ की तेजी कहां चली गई। ‘एनडीटीवी’ अपने ग्रुप एडिटर की कारगुजारियों की पोल पूरी सच्चाई से जनता के समक्ष क्यों नहीं खोल रहा है? वीर संघवी और बरखा दत्त जैसे बड़े पत्रकारों की ओछी हरकत पर मीडिया मौन साधे क्यों है? उनकी काली करतूत उजागर होने पर उन्हें पद से क्यों नहीं हटाया जा रहा है? शशि थरूर मामले में मीडिया जितनी जागरूक और सक्रिय थी, इस मामले में क्यों नहीं है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका जबाव मीडिया को जनता के समक्ष रखना होगा नहीं तो जो भी थोड़ा बहुत मीडिया पर जनता का विश्वास है वह भी उठ जाएगा। बरखा दत्त व वीर संघवी, देश के दो बड़े नामचीन पत्रकार। पैसा, रुतबा सभी तो है उनके पास। फिर उन्हें दलाली में मुंह काला करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? शायद असीमित महत्वाकांक्षा ही उन्हें ऐसे अमर्यादित कृत्य करने के लिए प्रेरित करती हो! ऊंचे ओहदे और मोटी सैलरी पर तैनात इन पत्रकारों ने अपनी साख और रुतबे का भी मान नहीं रखा। बरखा दत्त ने तो अपने पद्म सम्मान को भी कलंकित किया है। सरकार द्वारा पद्मश्री दिए जाने पर हमेशा से सवाल खड़ा होता रहा है। किन्तु बरखा दत्त व चटवाल जैसे दलालों व चाटुकारों को यह सम्मान दिया जाना इस सवाल के औचित्य पर मुहर लगाता है। नीरा राडिया के साथ-साथ बरखा दत्त और वीर संघवी भी अब देश के बड़े दलालों में शुमार हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि नीरा राडिया, बरखा दत्त और वीर संघवी ने मिलकर टाटा और अंबानी को संचार मंत्रालय से फायदा पहुंचाने के लिए दलाली की। पत्रकारिता की आड़ में दलाली कर रहे इन दोनों पत्रकारों के खिलाफ सीबीआई और आयकर विभाग के पास पुख्ता सबूत हैं। दलाली को लेकर इन लोगों के बीच फोन पर हुई बातचीत के टेप भी खुफिया एजेंसियों के पास उपलब्ध हैं। लेकिन इस मामले में दोनों पत्रकारों ने चुप्पी साध रखी है, और इसमें उनका साथ दे रही है मीडिया। शायद वे अपने रसूख और पहुंच की वजह से बेदाग साबित हो जाएं। सीबीआई और आयकर विभाग के सबूत का क्या? ये संस्थाएं तो प्रभाव के दबाव में काम करती हैं। सबूत को तोड़-मरोड़ कर आसानी से रफा-दफा करवाया जा सकता है। इस दलाली प्रकरण से सत्ता, उद्योग जगत, पत्रकारिता और नौकरशाहों के बीच के गंदे गठजोड़ का घिनौना रूप सामने आया है। कभी ये पत्रकार सत्ता के लिए दलाली करते हैं तो कभी उद्योग जगत के लिए, तो कभी मंत्री और नौकरशाहों के बीच का दलाल बन कर ट्रांसफर पोस्टिंग में माल कमाते हैं। अब अखबारों के मालिक भी प्रतिबद्ध पत्रकारों के बजाए दलालों को ही नियुक्त करना पसंद करते हैं ताकि उनका धंधा फलता-फूलता रहे। वैसे भी अब ईमानदार, सच्चरित्र और नैतिक लोगों के लिए इस गलीज पत्रकारिता में कोई जगह नहीं रह गई है। पत्रकारिता जगत के इन मठाधीशों के कारमानों के बाद क्या मीडिया से पारदर्शिता की उम्मीद की जा सकती है? शायद नहीं।

Wednesday, May 12

हिंदी राष्ट्र की बिंदी

किसी भी देश की राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगान व राष्ट्र ध्वज उस देश के लिए और वहां की जनता के लिए सम्मान और गौरव का प्रतीक होता है। हमारा देश धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। यहां विभिन्न भाषा, धर्म एवं वर्ण के लोग रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा ‘हिंदी’ को राष्ट्रभाषा के रूप में जन स्वीकृति प्राप्त है, किन्तु संवैधानिक रूप से इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त नहीं है। भारत में लगभग 347 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें 22 भाषाओं को संवैधानिक रूप से सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा प्राप्त है, उसमें हिंदी भी एक है। बड़े शर्म की बात है कि भाषा के मामले में समृद्ध इस देश की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। भारत के दस राज्यों में हिंदी को सरकारी काम-काज की भाषा का दर्जा प्राप्त है। भारत की ज्यादातर आबादी हिंदी जानती है, भले ही वे हिंदी भाषी न हों। किन्तु हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना उन्हें स्वीकार नहीं है। इतना ही नहीं भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या अंग्रेजी से ज्यादा है फिर भी हिंदी को माध्यम की भाषा न बनाकर अंग्रेजी को माध्यम की भाषा बनाया गया है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि बहुभाषीय देश में एक विदेशी भाषा ने इतनी मजबूती से जड़ जमा लिया है कि वह माध्यम की भाषा बन बैठी। यह भारत की संस्कृति पर कालिख पुतने के समान है। अंग्रेजों ने भी हमारी आपसी फूट और कलह का लाभ उठाकर जिस तरह सैकड़ों वर्ष तक राज किया था उसी तरह भाषा को लेकर आपसी फूट का ही नतीजा है कि आज हम अंग्रेजी भाषा के भी गुलाम हो गए और इसका मुख्य कारण भाषा को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की सस्ती राजनीति है। महाराष्ट्र में शिवसेना हो या मनसे, विधान सभा में अंग्रेजी में शपथ लेने वालों से कोई गुरेज नहीं, उन्हें हिंदी में शपथ ग्रहण करने वालों से परहेज है। सपा नेता को महाराष्ट्र विभानसभा में हिंदी में शपथ लेने का खमियाजा मनसे नेताओं का तमाचा खाकर भुगतना पड़ा। दरअसल, यह तमाचा सपा नेता पर नहीं बल्कि देश की भाषा और अस्मिता दोनों पर था। बंगाल हो या महाराष्ट्र कोई भी हिंदी अपनाने को तैयार नहीं, हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिए जाने के पुरजोर विरोध की शुरुआत दक्षिणी राज्यों से हुई। भाषा के सवाल पर भारतवर्ष में कलह व्याप्त है और नतीजे में अंग्रेजी भाषा सम्पूर्ण भारतीय समाज के सिर चढ़कर बोलने लगी है। इसका नशा नई पीढ़ी पर और चढ़ता ही जा रहा है। लोगों पर अंग्रेजियत का भूत इतना सवार है कि हिंदी जानते हुए भी वे अंग्रेजी में ही बात करना पसंद करते है। हिंदी में कोई सवाल कर रहा होता है तो उसका जवाब भी वे अंग्रेजी में ही देना पसंद करते हैं। हमारे लिए हर भाषा सम्माननीय है। विभिन्न भाषाओं को सम्मान देना और उसकी जानकारी रखना हमारे लिए ज्ञानवर्धक है। यह भी सच है कि हमारे देश के अधिकांश लोगों को दो से तीन भाषाओं की जानकारी भी है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम हिंदी की उपेक्षा कर अंग्रेजी को महत्व दें। हमें अपनी सभ्यता संस्कृति को संभालकर रखना है तो हमें अपनी भाषा को भी संभाल कर रखना होगा। उसे हमें विदेशी भाषाओं से श्रेष्ठ मानना और स्थापित करना होगा। हमें हिंदी पर गर्व करना चाहिए तभी देश गौरवान्वित होगा। हिंदी की उपेक्षा राष्ट्र की उपेक्षा है। हमें चीन से, रूस से, जापान से या इन जैसे तमाम उन देशों से सीख लेनी चाहिए जहां राष्ट्रभाषा का सम्मान राष्ट्रध्वज से कम नहीं। जहां के नेता या नागरिक कहीं भी जाएं अपनी राष्ट्रभाषा में ही बातें करेंगे। आपको समझने की जरूरत हो तो द्विभाषिये की मदद लें। क्या आप यह समझते हैं कि चीनी, जापानी या रूसी अंग्रेजी भाषा नहीं जानते? अगर आप ऐसा समझते हैं तो आपकी यह भयंकर भूल है, वैसी ही भूल जैसी आप अंग्रेजीदां बन कर कर रहे हैं...

Sunday, May 2

भ्रष्ट होता समाज

समाज आधुनिक से अत्याधुनिक होता जा रहा है, इधर के कुछ वर्षों में समाज में क्रांतिकारी परिर्वतन आए है। देश-दुनिया तकनीकी रूप से विकास की ऊंचाइयों को छूता गया किन्तु हम चारित्रिक रूप से पतन के गर्त में समाते चले गए। समाज में आदर्शों और चरित्रों के स्थान पर पैसे का बोल-बाला होता गया। समाज की विचारधाराएं बदलती गई और व्यक्ति के आचार-विचार व व्यवहार में आमूल परिवर्तन आ गया। आदर्श, ईमानदारी, नैतिकता की बातें अब किताबों तक ही सीमित रह गई है। इन सब बातों को आज व्यक्ति अपने जीवन में समाहित नहीं करता। यह सारी बातें आउट डेटेड हो गई हैं। आज लोग पैसों के लिए बुराइयों क सामना बड़ी सच्चाई और निडरता के साथ करने लगे हैं। अपने चारित्रिक दोषों को समाज के सामने जिस सच्चाई के साथ स्वीकार करते हैं उससे उन्हें शर्म नहीं आती बल्कि वे गौरवान्वित महसूस करते हैं। घूसखोरी, दलाली, जमाखोरी जैसी बुराइयां समाज द्वारा मान्यता प्राप्त सच्चाई है और इसे अच्छाई की श्रेणी में रखा गया है, आज का सच यही है। आधुनिकता का जामा ओढ़े आज का समाज अपनी सभ्यता-संस्कृति भूलता जा रहा है। हमारी संस्कृति हमें शालीनता, सलज्ज और सुसंस्कृत होने की शिक्षा देती है। जब तक समाज इस धरोहर को समेटे रखा, हमारे समाज में बुराइयां नाम मात्र थीं। किन्तु जब से हम अपनी संस्कृति को भूल पाश्चात्य जीवन शैली का दामन थाम इतराने लगे, समाज में बुराइयां जड़ जमाने लग गईं। हत्या, बलात्कार, लूटपाट की घटनाएं आम हो गईं। कोई वेलेंटाईन डे पर अपनी गर्ल फ्रेन्ड को गिफ्ट देने के लिए लूटपाट करता है, तो कोई प्रेयसी को पाने के लिए हत्या जैसे कर्म करने से भी नहीं हिचकता। रास्ते पर चलती लड़कियों से बलात्कार तो आम बात हो गई है, यह कैसा आधुनिक समाज है? जहां व्यक्ति, व्यक्ति से सुरक्षित नहीं, चारों तरफ अविश्वास फैला हो, जहां वचनों का कोई मोल नहीं, संपत्ति के लिए भाई-भाई का दुश्मन हो रहा हो, बेटी बाप जैसे पवित्र संबंध सुरक्षित नहीं। लड़कियां अपनी आधुनिक जीवन शैली को बरकरार रखने के लिए वेश्यावृत्ति तक करने से नहीं हिचकती। तथाकथित आधुनिक समाज पाप के पंक में धंसता जा रहा है फिर भी उसे एक ऐसे मजबूत डोर की जरूरत महसूस नहीं हो रही जिसे पकड़कर इस दलदल से बाहर आ सके। समाज पर पाप का बोझ बढ़ता जा रहा है, घड़ा छलकने को है, विनाश तो प्रत्यक्ष है ही।

Saturday, May 1

विचार

आज का विचार
मेरा विचार ही मेरी आचार-संहिता है...